घनश्याम जोशी, बागेश्वर। Australian Merino sheep: पलायन एवं बेरोजगारी आपस में जुड़ी और उत्तराखंड की बड़ी समस्या है। इस समस्या के समाधान की दिशा में आस्ट्रेलियन मेरिनो भेड़ बड़ी उम्मीद जगा रही हैं। राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत 2019 में उत्तराखंड को मिली 40 नर 200 मादा मेरिनो भेड़ों का कुनबा पशुपालन विभाग ने बढ़ा लिया है। भेड़ों की नस्ल सुधार कार्यक्रम के उद्देश्य से उच्च गुणवत्ता व अधिक उत्पादन का लाभ अब स्थानीय पशुपालकों को दिया जाना है। जिससे पहाड़ के बकरी व भेड़पालक अपनी आर्थिकी को मजबूत कर सकेंगे।

स्थानीय भेड़ों से 50 से 90 रुपये प्रति किलो तक ऊन बेचने वाले पालक मेरिनो भेड़ का ऊन 750 से 1000 रुपये में बेचेंगे। बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील अंतर्गत पिंडारी घाटी क्षेत्र के कर्मी, शामा और लीती में पशुपालन विभाग आस्ट्रेलियन मेरिनो भेड़ पाल रहा है। यहां प्रजनन केंद्रों में पांच नर मेरिनो भेड़ों के जरिये दो साल बाद दो सौ से अधिक मेमने पैदा होने से कुनबा बढ़ गया है। लीती में इसके लिए ऊन निकालने की यूनिट भी लगाई गई है।

आस्ट्रेलियन भेड़ों की स्थिति

शामा में स्थित प्रजनन केंद्रों को 2019 में दो मेरिनो नर भेड़ मिले। यहां 146 कश्मीरी मादा भेड़ थीं। क्रास ब्रीडिंग के बाद 2020 में 51 व 2021 में 42 बच्चे पैदा हुए हैं। कर्मी में 210 रैबुलो प्रजाति की मादा भेड़ पहले से थीं। यहां तीन नर मेरिनो भेड़ों से क्रास ब्रीडिंग के बाद दो साल में 145 मेमने  पैदा हुए हैं। वहीं लीती रेङ्क्षजग यूनिट में 88 भेड़ हैं।

मेरिनो भेड़ की यह है खासियत

आस्ट्रेलियन मेरिनो भेड़ की खासियत यह है कि इनसे प्राप्त होने वाला ऊन बेहतरीन क्वालिटी का होता है। साल में दो बार कुल तीन से पांच किलो ऊन प्राप्त होता है। जिसकी कीमत 750 से 1000 रुपये तक रहती है। जबकि स्थानीय नस्ल से साल में एक बार एक से दो किलो ऊन प्राप्त होता। जिसकी कीमत 50 से 90 रुपये के बीच मिलती है। करीब साढ़े तीन लाख रुपये की मेरिनो भेड़ में मांस भी अधिक होता है। फिलहाल इन केंद्रों से ऊन का उत्पादन कर पशुपालन विभाग इसे ऋषिकेश यूनिट को भेज रहा है। जहां से ग्रेडिंग के बाद उप्र, लुधियाना व पंजाब के खरीदार ऊन लेकर जाते हैं।

अब तक बागेश्वर से तैयार ऊन

कर्मी में 2021 में 701 किलो और 2022 में अब तक 433 किलो ऊन का उत्पादन हुआ है। शामा में पिछले साल 178 और इस वर्ष 130 किलो ऊन निकाला गया। लीती रेङ्क्षजग यूनिट से अभी तक 85 किलो का उत्पादन मिला है। इस लिहाज से दो साल में कुल 1527 किलो ऊन तैयार हो चुका है।

राज्य में करीब 17000 भेड़पालक

उत्तराखंड में बागेश्वर, पिथौरागढ़, टिहरी, चमोली व उत्तराकाशी का क्षेत्र भेड़ व बकरी पालन के लिए जाना जाता है। बर्फ पिघलने के बाद उच्च हिमालय के बुग्यालों में भेड़ बकरियों को एक साथ चरवाहे ले जाते हैं और फिर घाटी की ओर लौट आते हैं। राज्य में करीब 17 हजार भेड़-बकरी पालक हैं। पशुपालन मंत्री रेखा आर्य के मुताबिक भेड़ों की नस्ल सुधार कार्यक्रम का मकसद लोगों की आर्थिकी सुधारना है। साथ ही करीब 550 मीट्रिक टन ऊन उत्पादन को सरकार 1000 मीट्रिक टन तक ले जाना चाहती है।

मुख्य पशुचिकित्साधिकारी आर चंद्रा ने बताया कि आस्ट्रेलियन मेरिनो भेड़ों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है। अब प्लान किया गया है कि शीघ्र पशुपालकों को भी यह भेड़ प्रदान की जाएंगी। यह स्थानीय पशुपालकों के लिए आय बढ़ोत्तरी का बड़ा जरिया बनेगा।

Edited By: Prashant Mishra