नैनीताल, जेएनएन : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण संवैधानिक अधिकार नहीं है। यह भी कहा है कि यह राज्य सरकार के विवेक पर है। कोर्ट ने उच्च न्यायालय के नए प्रमोशन में आरक्षण देने, डाटा कलेक्शन कर निर्णय लेेने के आदेश को गलत ठहराया है। सर्वोच्च अदालत ने पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेशों को निरस्त कर दिया।

पदोन्नति में आरक्षण मामले में नैनीताल हाई कोर्ट ने अलग-अलग याचिकाओं पर तीन आदेश पारित किए थे। कोर्ट ने पिछले साल पहली अप्रैल को पारित एक आदेश में नए प्रमोशन में आरक्षण देने के निर्देश दिए। फिर इस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को पहले कर्मचारियों का डाटा कलेक्शन करने और फिर निर्णय लेने का आदेश पारित किया जबकि तीसरे आदेश में सरकार को पदोन्नति में आरक्षण देेने व रिक्त पदों पर पदोन्नति में आरक्षण देने का आदेश पारित किया। हाई कोर्ट के इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर चुनौती दी गई। सर्वोच्च अदालत के न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव व न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने एसएलपी को निस्तारित करते हुए नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।

हाई कोर्ट में राज्य सरकार के मुख्य स्थाई अधिवक्ता परेश त्रिपाठी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण संवैधानिक अधिकार नहीं है, यह राज्य सरकार के विवेक पर है, किसे पदोन्नति दे, किसे ना दे। यहां बता दें हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यही दलील पेश की गई थी। यहां उल्लेखनीय है कि राज्य के विभागों में पदोन्नति पर रोक लगी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एससी-एसटी कर्मचारी संगठनों को बड़ा झटका लगा है जबकि सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को राहत मिली है।

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Posted By: Skand Shukla

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