उत्तराखंड की पहचान हैं पहाड़ी नदियां, मानसून के बाद निखरता है गाड़-गदेरों और झरनों का सौंदर्य
पहाड़ की नदियां और झरने पर्वतीय जीवन की धड़कन हैं, जो मानसून के बाद अपने सबसे सुंदर रूप में दिखते ...और पढ़ें
HighLights
पहाड़ की नदियाँ और झरने पर्वतीय जीवन की धड़कन हैं।
मानसून के बाद जलधाराएं अपने सबसे सुंदर और जीवंत रूप में होती हैं।
छोटी नदियाँ कृषि और स्थानीय जल जरूरतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
शैलेंद्र गोदियाल, हरिद्वार। पहाड़ में नदियों का अपना समृद्ध प्राकृतिक तंत्र है, यहां नदी पहाड़ की धड़कन हैं। इनके साथ पहाड़ का जीवन भी आगे बढ़ता है।
ऊंची हिमाच्छादित चोटियों से, चट्टान की दरार से रिसती पतली धारा कुछ कदम चलकर झरना बन जाती है, तो कहीं ग्लेशियर तो कहीं जंगल के बीच कल-कल करत गाड़-गदेरा ( छोटी नदी) आगे जाकर नदी का रूप ले लेती हैं।।
मानसून की बर्षा के बाद सितंबर से लेकर नवंबर में पहाड़ की ये जलधाराएं अपने सबसे निखरे रूप में दिखाई देती हैं। जो पहाड़ के सौंदर्य की सबसे जीवंत तस्वीर बन जाती हैं। वर्षा से धुली चट्टानों के बीच दूधिया धार की तरह गिरते झरने, जंगलों के बीच कल-कल करती छोटी नदियां और पहाड़ी ढलानों से उतरता निर्मल पानी ऐसा दृश्य रचता है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।
अधिकांश छोटी नदी के नाम में जुड़ा है गंगा का नाम
हरिद्वार। पहाड़ की छोटी नदियों का अपना नाम, अपना भूगोल और अपनी अलग पहचान है। इन नामों में गंगा, गाड़-गदेरा, धारा खाला जुड़ने की परंपरा भी पहाड़ की नदी संस्कृति का हिस्सा है।

केदार गंगा, जाड़ गंगा, असी गंगा, बाल गंगा, धर्म गंगा, ऋषि गंगा, धौली गंगा, विष्णु गंगा, रामगंगा, कमल गंगा, रुद्र गंगा, आकाश गंगा, तेल गंगा, कंकण गंगा, हनुमान गंगा, क्षीरो गंगा सहित नदियों के नाम गंगा से हैं। इसके अलावा पहाड़ी छोटी नदी के नाम गाड़-गदेरा, धारा व खाला नाम से भी हैं। जो नदी-तंत्र संबंधी अभिलेखों में भी उत्तराखंड की ऐसी सैकड़ों नामित और हजारों छोटी-अनाम जलधाराओं का उल्लेख है।
उत्तरकाशी से चमोली तक झरनों की अलग दुनिया
उत्तरकाशी से गंगोत्री की ओर बढ़ें तो सड़क के दोनों ओर पहाड़ों से उतरती अनगिनत जलधाराएं दिखाई देती हैं। इस मार्ग पर करीब हर 500 मीटर के अंतराल में कोई न कोई छोटी जलधारा या झरना दिखाई देता है।
इनमें कुछ मानसून के साथ जीवंत होते हैं, जबकि कुछ जलस्रोत बारहमासी हैं। गंगोत्री क्षेत्र में तो केदार गंगा स्वयं भागीरथी में गिरने से पहले एक खूबसूरत जलधारा का रूप लेती है। हर्षिल घाटी में भी कई झरने हैं। चमोली में पीपलकोटी से बदरीनाथ और माणा तक का मार्ग झरनों और पहाड़ी जलधाराओं के लिहाज से बेहद समृद्ध है। यहां जगह-जगह पहाड़ की चट्टानों से अविरल गिरती जल धाराएं दिखाई देती हैं।

इन बिखरी जलधाराओं की खूबसूरती बेहद ही खास है। बदरीनाथ-माणा क्षेत्र में वसुधारा जलप्रपात, जोशीमठ के पास ज्ञान गंगा झरना सहित कई हैं। गौरीकुंड से केदारनाथ तक का मार्ग जंगलों, पहाड़ों और हिमालयी जलधाराओं के बीच से होकर गुजरता है।
पहाड़ में खेतों की प्यास बुझाता गदेरों का पानी
हरिद्वार। पहाड़ के लिए इन जलधाराओं का महत्व इससे भी बड़ा है। गांवों के आसपास के प्राकृतिक स्रोत, गाड़-गदेरे( छोटी नदियां) स्थानीय जल जरूरतों और खेती के लिए आधार रहे हैं। पहाड़ी खेतों की सीढ़ियां भले ही छोटी दिखाई दें, लेकिन इनके पीछे पानी की यही छोटी-छोटी धाराएं बड़ी भूमिका निभाती हैं।
पहाड़ में इस जलचक्र की शुरुआत ऊंची चोटियों, ग्लेशियरों, जंगल और वर्षा से होती है और जो गाड़-गदेरों से होते हुए बड़ी नदियों तक पहुंचता है। किसी चट्टान से गिरती छोटी सी धारा देखने में भले ही क्षणिक लगे, लेकिन वही धार आगे चलकर पहाड़ के खेतों, गांवों और अंततः गंगा-यमुना के विशाल जलतंत्र का हिस्सा बनती है।
