EXPLAINER: ईडी की कार्रवाई को सियासी हथियार में बदलने की कोशिश या कुछ और... हरदा ने क्यों चला इस्तीफे की पेशकश का दांव?
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश की है। यह कदम उनके ...और पढ़ें


समय कम है?
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राज्य ब्यूरो, देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2017 से सत्ता में आने को छटपटा रही कांग्रेस में अब आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के बीच अंदरुनी सियासत एक बार फिर करवट ले रही है। इस कड़ी में वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य पदों से इस्तीफे की पेशकश को महज नैतिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं माना जा रहा।
उनके ओएसडी रहे चंदन सिंह जीना पर ईडी की कार्रवाई के बाद आई यह पेशकश एक साथ बचाव, दबाव और राजनीतिक संदेश, तीनों का दांव नजर आ रहा है।
दरअसल, जीना वर्ष 2014 से 2017 के बीच मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत के ओएसडी व निजी सहायक रहे हैं। ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में अनियमितताओं से जुड़े मनी लांड्रिंग मामले में जीना के ठिकाने पर कार्रवाई की। ऐसे में जांच की आंच सीधे रावत तक भले नहीं पहुंची हो, लेकिन राजनीतिक रूप से इससे उनके कार्यकाल और नेतृत्व को सवालों के घेरे में लाने की कोशिश स्वाभाविक है।
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हरदा यह बखूबी जानते हैं कि चुनावी वर्ष में उनके सहयोगी से जुड़ी ईडी कार्रवाई भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकती है। ऐसे में पद छोड़ने की पेशकश कर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उनकी व्यक्तिगत वजह से कांग्रेस की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।
उन्होंने स्वयं कहा कि यदि उनके किसी कार्य से पार्टी के संघर्ष को कमजोरी आती है तो वह ऐसा नहीं चाहेंगे। साथ ही उन्होंने जीना के खिलाफ लगे आरोपों पर विश्वास नहीं जताया और कहा कि सच्चाई समय के साथ सामने आएगी। यानी, उन्हाेंने एक प्रकार से 'पहले मैं खुद हटता हूं, फिर मेरे ऊपर सवाल खड़े करो' वाला राजनीतिक कवच तैयार किया है।
हरदा यदि इस कार्रवाई को अपने खिलाफ सीधे हमले के बजाय कांग्रेस के खिलाफ बनाए जा रहे राजनीतिक नैरेटिव के रूप में पेश करते हैं तो वह अपने लिए दो रास्ते खोलते हैं। पहला, पार्टी के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करना और दूसरा, समर्थकों के बीच यह संदेश देना कि चुनाव से पहले उन्हें घेरने की कोशिश हो रही है।
दबाव की रणनीति की तौर पर भी देखी जा रही पेशकश
कांग्रेस की चुनावी तैयारियों के बीच हरदा लंबे समय से पार्टी में एक प्रकार से हाशिये पर दिख रहे हैं। पार्टी की पिछली गतिविधियां इसका उदाहरण है।
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प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा जब उत्तराखंड के दाैरे पर आई तो हरदा एकाध बार ही दिखे। इसके बाद देहरादून में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के छात्रों की गूज कार्यक्रम की बात हो या कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी की सभा, इन बड़े कार्यक्रमों उनकी मौजूदगी कम ही दिखाई दी।
यही नहीं, पूर्व में जब दिल्ली में छह नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया तो इसमें हरदा की पसंद को तवज्जो नहीं दी गई। सियासी गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व हरदा को संकेत दे चुका है कि अब नई पीढ़ी के कंधों पर ही वह चुनाव लड़ेगी।
आगामी चुनाव में पार्टी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डा.हरक सिंह रावत की चौकड़ी के साथ ही जनता के बीच जाएगी।
बेशक, कालांतर में सभी ने कहीं न कहीं हरीश रावत की अगुआई में काम किया है, लेकिन सभी की अपनी-अपनी ताकत व गुट हैं। ऐसे में हरदा स्वंय को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि मोटे तौर पर जिस तरह से उनके बिना कांग्रेस आगे बढ़ रही है, ऐसे में माना जा रहा कि वह सम्माजनक विदाई के लिए रास्ता तलाश रहे हैं। जीना के प्रकरण के चलते उन्हें इसका मौका भी मिल गया है।
