यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 29, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
जंगल की बात : कार्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व की धारण क्षमता का अध्ययन के लिए बजट का इंतजार
कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी टाइगर रिजर्व में हाथी का कुनबा निरंतर बढ़ रहा है। पिछली गणना के अनुसार जंगलों ...और पढ़ें

केदार दत्त, देहरादून। उत्तराखंड में राष्ट्रीय पशु बाघ और राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी का कुनबा निरंतर बढ़ रहा है। पिछली गणना के मुताबिक यहां के जंगलों में बाघों की संख्या 442 है, जबकि हाथी 2026। अब जिस हिसाब से बाघ व हाथी बढ़ रहे हैं, उनके लिए जंगल में उसी अनुपात में वासस्थल भी जरूरी है। यानी संबंधित क्षेत्रों की धारण क्षमता कितनी है, उसका पता होना आवश्यक है। यह वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ ही प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी के दृष्टिगत पूर्व में कार्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व की धारण क्षमता का अध्ययन कराने का निर्णय लिया गया। तय हुआ कि भारतीय वन्यजीव संस्थान से यह अध्ययन कराया जाएगा और प्रतिकरात्मक वन रोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण से वित्त पोषण होगा। संस्थान ने पिछले वर्ष जुलाई में यह प्रस्ताव भी विभाग को भेजा, लेकिन बजट अभी तक नहीं मिल पाया है। नतीजतन, मुहिम आगे नहीं बढ़ पा रही।
एंगलिंग से भी स्वरोजगार के अवसर
कोरोना संकट के चलते बदली परिस्थितियों में स्वरोजगार पर खास फोकस है। इस कड़ी में 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में वन विभाग के माध्यम से इस तरह की अनेक पहल की जा रही हैं। इन्हीं में एक है एंगलिंग। यहां के जंगलों से गुजरने वाली नदियों में एंगलिंग की कसरत शुरू कर दी गई है। इसके अंतर्गत मछलियां पकड़कर उन्हें सुरक्षित उसी पानी में छोड़ दिया जाता है। वन विभाग ने एंगलिंग के लिए अनुमति देना भी शुरू कर दिया है। वर्तमान में तीन नदियों में एंगलिग की अनुमति दी गई है और अब इसे बढ़ाने की दरकार है। इससे स्थानीय स्तर पर गाइड, होम स्टे के रूप में स्वरोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जो पलायन को रोकने में मददगार साबित होंगे। साथ ही नए पर्यटक स्थल भी विकसित होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और वन विभाग एंगलिंग की पहल को तेजी से आगे बढ़ाएंगे।
फसल पैटर्न में बदलाव की दरकार
राज्य में वन्यजीवों द्वारा फसलें चौपट करने से किसानों के माथों पर लगातार बल पड़ रहे हैं। कहीं हाथी फसलों को चौपट कर रहे तो कहीं बंदर, लंगूर, वनरोज, सूअर जैसे जानवर। पहाड़ से लेकर मैदान तक वन सीमा से सटे क्षेत्रों में सभी जगह यह समस्या बनी हुई है। ऐसे में लोग खेती से विमुख हो रहे तो यह गांवों से पलायन का कारण भी बन रही है। ऐसे में यह आवश्यक है कि वन क्षेत्रों से लगे आबादी वाले क्षेत्रों में खेती के पारंपरिक पैटर्न में बदलाव लाया जाए। पूर्व में इस क्रम में राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे तमाम गांवों में किसानों को सगंध खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया तो इसके बेहतर नतीजे सामने आए। वहां खेतों में जंगली जानवरों की आवाजाही तो रुकी ही किसानों को इससे अच्छी आय भी हुई। दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसे कदमों को तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
कब बनेंगे जैव विविधता विरासतीय स्थल
समूचा उत्तराखंड अपनी जैव विविधता के लिए विशिष्ट पहचान रखता है। जैव संसाधनों के संरक्षण-संवद्र्धन के लिए राज्य में जैव विविधता अधिनियम भी लागू है। इसके साथ ही जैव विविधता के लिहाज से बेहद धनी स्थलों के संरक्षण के लिए उन्हें जैव विविधता विरासतीय स्थल के रूप में अधिसूचित करने का प्रविधान भी है। बावजूद इसके राज्य गठन से अब तक एक भी जैव विविधता विरासतीय स्थल आकार नहीं ले पाया है। वह भी तब जबकि पिथौरागढ़ जिले में थलकेदार और टिहरी जिले में देवलसारी के लिए कागजी कवायद लंबे अर्से से चल रही है। यह ठीक है कि किसी क्षेत्र के जैव विविधता विरासतीय स्थल घोषित होने के बाद स्थानीय समुदाय के लिए बंदिशें बढ़ जाती हैं, लेकिन यहां तो समुदाय की ओर से उठ रही मांग को भी अनसुना किया जा रहा है। देवलसारी इसका उदाहरण है, जहां के निवासियों ने खुद विरासतीय स्थल का प्रस्ताव दिया है।
