नेपाल आपदा से ली सीख, उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने में जुटे विज्ञानी
उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में हिमनद झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है।


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राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून । उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हिमनद झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की कवायद प्रारंभ हो गई है।
चमोली जिले में करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील में प्रदेश का पहला ग्लेशियल लेक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है।
इसके लिए केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआइ) रुड़की और वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान देहरादून के विज्ञानी और तकनीकी विशेषज्ञ जुटे हुए हैं। अभियान के लिए 21 सदस्यीय दल 28 सितंबर को देहरादून से रवाना हुआ था।
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बदलावों की निगरानी
अर्ली र्वानिंग सिस्टम के तहत सेंसर के माध्यम से झील के जलस्तर और आसपास की परिस्थितियों में होने वाले बदलावों की निगरानी की जाएगी।
आंकड़ों में असामान्य बदलाव सामने आने पर संबंधित एजेंसियों को समय रहते अलर्ट देने में मदद मिलेगी। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी हिमनद झील से अचानक टूटने की स्थिति में संभावित बाढ़ के जोखिम को समझने और आपदा प्रबंधन की तैयारी मजबूत करने में मदद मिलेगी।
बता दें कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और तकनीकी संस्थानों ने वसुंधरा ताल को उत्तराखंड की उन 13 हिमनद झीलों में शामिल किया है, जो उच्च जोखिम वाली श्रेणी की है। ऐसे में यहां निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित कर रही टीम को आइटीबीपी और एसडीआरएफ का सहयोग मिल रहा है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में मौसम और ग्लेशियरों में बदलाव के बीच ऐसी प्रणालियां आपदा जोखिम कम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
