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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 01, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

यहां हवा में है हवा का सफर, कागजों में दस साल से है पर्यटकों के रोमांच को बढ़ाने वाली ये योजना

By Raksha PanthariEdited By:
Published: Fri, 01 Jan 2021 12:56 PM (IST)

उत्तराखंड की वादियां और प्राकृतिक नजारे बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। पर्यटकों के सफर के रोमांच ...और पढ़ें

उत्तराखंड में हवा में है हवा का सफर।
उत्तराखंड में हवा में है हवा का सफर।

विकास गुसाईं, देहरादून। उत्तराखंड की वादियां और प्राकृतिक नजारे बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। पर्यटकों के सफर के रोमांच को और बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार ने कई स्थानों पर रोपवे बनाने का निर्णय लिया। इनमें प्रमुख रूप से देहरादून-मसूरी रोपवे के अलावा नैनीताल, केदारनाथ, भैरवगढ़ी, कालेश्वर मंदिर, गंगोत्री धाम में बनने वाले रोपवे शामिल हैं। कागजों में यह योजना तकरीबन 10 साल से चल रही है, मगर इनमें से कोई भी अभी तक परवान नहीं चढ़ पाई है। सरकार ने इन सभी रोपवे को पीपीपी मोड में बनाने का निर्णय लिया है। अभी स्थिति यह है कि किसी योजना में डीपीआर बन रही है, तो कहीं जमीन तलाशी जा रही है। कुछ में तो अभी तक कार्यदायी एजेंसी का चयन भी नहीं हुआ है। कोरोना के कारण मार्च के बाद काम थमे हुए हैं। इस कारण हवा में सफर का उम्मीद फिलहाल हवा में ही अटकी हुई है।

सड़क दुर्घटनाओं पर कैसे लगेगी लगाम 

इस वर्ष कोरोना काल के बावजूद प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं पर रोक नहीं लग पाई। उत्तरकाशी और पिथौरागढ़, दो ऐसे जिले हैं, जिनमें सड़क दुर्घटना और मृतकों की संख्या में इजाफा दर्ज किया किया गया है। बावजूद इसके सड़क सुरक्षा पर बहुत अधिक काम नहीं हो पाया है। चिंताजनक बात यह है कि प्रदेश में 2017 से अभी तक चिह्नित 1874 दुर्घटना संभावित स्थलों में से 1240 पर काम नहीं हुआ है। इनमें 290 स्थल ऐसे हैं, जहां 100 मीटर से गहरी खाई है और यहां क्रैश बैरियर भी नहीं लगे हैं। चारधाम ऑल वेदर रोड निर्माण के दौरान कई स्थानों पर रास्ता तैयार करने के लिए पहाड़ काटे गए हैं। इस कारण यहां कई नए डेंजर जोन बन रहे हैं। सड़क दुर्घटना के इसी वर्ष के आंकड़ों को देखें तो अक्टूबर तक 796 दुर्घटनाएं हुई हैं, इनमें 319 व्यक्तियों की मौत हुई है और 638 व्यक्ति घायल हुए हैं।

क्या कभी मिलेगा एक सुरक्षित ठिकाना 

उत्तराखंड आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील राज्य है। विशेषकर प्राकृतिक आपदाएं यहां के निवासियों पर कहर बनकर टूटती हैं। वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक आपदा को देश-दुनिया देख चुकी है। इसे देखते हुए आपदा संवेदनशील गांवों को विस्थापित करने का निर्णय लिया गया था। इसमें प्रदेश के 421 गांवों का चयन किया गया। वर्ष 2011 में इन गांवों को अन्यत्र बसाने को पुनर्वास नीति बनाई गई। इस बात को नौ वर्ष गुजर चुके हैं। इस अंतराल में दो सरकार बदल चुकी हैं, लेकिन मात्र 26 गांवों के 634 लोगों का ही पुनर्वास हो पाया है। शेष गांवों के पुनर्वास के लिए जमीन ही नहीं मिल पाई है। इस कारण पर्वतीय इलाकों के इन गांवों में आपदा का खतरा बना हुआ है। आज भी तेज बरसात आते ही लोग सिहर उठते हैं। शासन-प्रशासन तक तमाम गुहार लगाने के बावजूद अभी तक इनके विस्थापन की कार्यवाही पूरी नहीं हो पाई है।

बिना नीति दम तोड़ रहे पौधे

उत्तराखंड में प्रतिवर्ष औसतन डेढ़ करोड़ से ज्यादा पौधे रोपे जा रहे हैं। इस लिहाज से प्रदेश में हरियाली का दायरा बहुत अधिक बढ़ जाना चाहिए, मगर ऐसा हुआ नहीं। इसलिए, क्यों रोपित पौधों में से बहुत अधिक जीवित नहीं रहते हैं। इसका एक कारण इनकी अनदेखी भी है। हालांकि, प्रविधान है कि विभागीय पौधारोपण में रोपित पौधों की तीन साल तक देखभाल होगी, लेकिन पर्याप्त बजट समेत अन्य संसाधनों के अभाव में यह मुहिम अक्सर दम तोड़ देती है। परिणामस्वरूप पौधे रोपने के बाद इन्हेंं अपने हाल पर छोड़ने की परिपाटी भारी पड़ रही है। इसके लिए नई पौधारोपण नीति बनाने की बात कही गई। इस पर शुरुआत में थोड़ा काम भी हुआ लेकिन सरकारों की प्राथमिकता में यह शामिल नहीं रही। किसी ने इस ओर बहुत ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया। नतीजतन राज्य गठन के 20 साल बाद भी पौधारोपण की नीति में बदलाव नहीं हो पाया है। 

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