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उत्तराखंड में अब नहीं चलेंगे अंग्रेजी शासनकाल के सिंचाई नियम कायदे, सरकार ने निरस्त किया पुराना अधिनियम

Published: Tue, 27 Oct 2026 05:14 PM (IST)

उत्तराखंड सरकार ने ब्रिटिशकालीन उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम-1873 को निरस्त कर दिया है। इसके स्थान पर उत्तराखंड ...और पढ़ें

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HighLights

  1. ब्रिटिशकालीन उत्तरी भारत नहर अधिनियम-1873 निरस्त किया गया।

  2. उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक सदन में पेश।

  3. सिंचाई विभाग को अतिक्रमण, जल चोरी रोकने के अधिकार।

राज्य ब्यूरो, जागरण, गैरसैंण। उत्तराखंड सिंचाई विभाग में अब अंग्रेजी शासनकाल के नियम कायदे नहीं चलेंगे। संविधान पूर्व के केंद्रीय कानूनों को रद करने अथवा उन्हें नए सिरे से लागू करने पर विचार की केंद्र की अपेक्षा के अनुरूप धामी सरकार राज्य में लागू उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम-1873 को निरस्त कर इसके स्थान पर उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी अधिनियम लेकर आई है।

इससे संबंधित विधेयक मंगलवार को विधानसभा सत्र के पहले दिन सदन में पेश किया गया। इससे सिंचाई विभाग ज्यादा अधिकार संपन्न होगा। वह सिंचाई एवं जल निकासी से संबंधित योजनाएं तैयार करेगा। साथ ही राज्य की नदियों, गाड-गदेरों, नहरों व गूलों पर अतिक्रमण और पानी की चोरी रोकने को प्रभावी कदम उठा सकेगा।

उत्तराखंड बनने के बाद सरकार ने उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम को अंगीकृत किया, लेकिन आज की परिस्थितियों में इसके तमाम प्रविधान अप्रसांगिक हो गए थे। इसके दृष्टिगत अपना कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए।

धामी कैबिनेट की हाल में हुई बैठक में उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी अधिनियम से संबंधित प्रस्ताव को अनुमोदित किया गया था। अब सरकार ने विधानसभा के गैरसैंण सत्र में इसे सदन की मुहर के लिए विधेयक भी पेश भी कर दिया।

विधेयक में अतिक्रमण व पानी की चोरी के मामलों में सिंचाई विभाग को कार्रवाई और जुर्माना वसूलने का अधिकार दिया गया है। यद्यपि, जुर्माने की दरें सरकार तय करेगी। विधेयक में प्रविधान प्रस्तावित है कि किसी भी नदी, गाड-गदेरों अथवा जलस्रोतों से पानी लेने को सिंचाई विभाग की सहमति अनिवार्य होगी।

नहरों के निर्माण व रखरखाव के लिए विभाग को अतिरिक्त शक्तियां दी गई हैं। रखरखाव में हीलाहवाली पर जवाबदेही तय की गई है। नहरों से फसल की सिंचाई को पानी की अनुमति तब तक रहेगी, जब तक कि एक फसल पक नहीं जाती।

वितरण व्यवस्था में कोई बदलाव किया जाता है, इसे लागू करने से पहले कम से कम एक फसली सीजन का वक्त हितधारकों को दिया जाएगा। मवेशियों के लिए नहरों से पानी निश्शुल्क लिया जा सकेगा।

तालाबों व प्राकृतिक गड्ढों को नहरों के पानी से भरकर इसका उपयोग सिंचाई के लिए हो सकेगा। जलापूर्ति में विफलता, बाढ़ व आपदा के कारण क्षतिग्रस्त फसलों के लिए नियमानुसार मुआवजा राशि प्रदान की जाएगी।

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