उत्तराखंड के जंगलों में दुर्लभ प्रजाति के वनस्पति पौधों ने फिर जमाई जड़ें
उत्तराखंड के जंगलों में विलुप्ति की कगार पर खड़ी दुर्लभ वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक आवास में फिर से स्थापित करने के प्रयास सफल हो रहे हैं।
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अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ और राज्य विविधता बोर्ड ने जताई उम्मीद।
HighLights
उत्तराखंड में दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण प्रयास सफल।
11 में से 7 प्रजातियों के पौधे प्राकृतिक आवास में जीवित।
जटामांसी जैसी कुछ प्रजातियों में चुनौतियां बरकरार।
केदार दत्त, जागरण, देहरादून। उत्तराखंड के जंगलों से विलुप्ति की ओर बढ़ रही दुर्लभ वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक आवास में फिर से स्थापित करने की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आइयूसीएन) और राज्य विविधता बोर्ड की संकटग्रस्त वनस्पतियों की सूची में शामिल 11 प्रजातियों के संरक्षण को शुरू किए गए अभियान में सात प्रजातियों के पौधों ने जंगलों में जड़ें जमाकर उम्मीद जगाई है।
एक वर्ष के बाद हुए आकलन में इनके जीवित रहने के उत्साहनजक नतीजे सामने आए हैं। यद्यपि, जटामासी समेत तीन अन्य प्रजातियों के नतीजे संरक्षण की चुनौती भी उजागर कर रहे हैं। अत्यधिक दोहन, प्राकृतिक आवासों के सिकुडऩे और जलवायु परिवर्तन के चलते दुर्लभ प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। इसे देखते हुए वन विभाग की अनुसंधान शाखा ने पिछले वर्ष जुलाई में संकटग्रस्त सूची में शामिल 11 प्रजातियों के करीब 1400 पौधे अलग-अलग स्थलों पर रोपे।
तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी की अगुआई में शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य जंगलों से गायब होती वनस्पतियों को उनके मूल प्राकृतिक आवास में दोबारा स्थापित करना है। अब आकलन किया गया तो सात प्रजातियाें के 42 से 100 प्रतिशत तक पौधे प्राकृतिक आवास में जीवित रहे। अनुसंधान शाखा की प्रगति रिपोर्ट में यह तस्वीर सामने आई है।
यह रही स्थिति
-काकड़सिंघी (पिस्तानिया इंटिग्रेमा) :- रानीखेत के पास कालिका में लगाए सभी 10 पौधे जीवित।
-हिमालयन आर्नेबिया (आर्नेबिया बेंथामी:- बदरीनाथ के पास माणा वन पंचायत में 3249 मीटर ऊंचाई पर 50 में से 45 पौधे जीवित।
-गैंटी (इंडोपिप्टाडेनिया औधेंसिस):- चंपावत की हनुमान चट्टी में 86 प्रतिशत पौधे जिंदा।
-सतुवा (पेरिस पालीफिला :- गोपेश्वर के मंडल में 75 प्रतिशत पौधे जीवित मिले।
-कुमाऊं फैनपाम (ट्रैकीकार्पस टाकिल) :-पिथौरागढ़ के गिनी बैंड के पास 65 प्रतिशत सफलता।
-हिमालयन लिली (लिलियम पालीफिलम ):- उत्तरकाशी की नेलांग घाटी में 61 प्रतिशत पौधे जीवित।
चुनौती बरकरार
रिपोर्ट के अनुसार मुनस्यारी में 3467 मीटर की ऊंचाई पर खलिया टाप में लगाए जटामांसी के 200 में से मात्र 15 पौधे ही जिंदा रह पाए, जबकि नैनीताल के पास लड़ियाकांटा में तुमरी के 350 में 260 पौधे नष्ट हो गए। पटवाडांगर में पटवा के 350 में से 150 पौधे जीवित मिले, जबकि राजाजी टाइगर रिजर्व के मोहंड क्षेत्र में वन मूली में कोई अंकुर नहीं फूटा। इसके अलावा चकराता के कनासर में त्रायमाण के 157 में से पांच पौधे ही दिखे।
वन अनुसंधान शाखा के अनुसंधान अधिकारी मनोज सिंह संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के नतीजे बताते हैं कि इन्हें नर्सरी में तैयार कर उनके प्राकृतिक आवासों में फिर से स्थापित किया जा सकता है। बशर्ते इन्हें अनुकूल आवास में लगाया जाए और स्थलों की सुरक्षा व निगरानी हो।
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