विजय मिश्रा, देहरादून। रामचरितमानस का यह संदेश 'भय बिनु होइ न प्रीति' बहुचर्चित है। जब अनुरोध का प्रभाव न हो तो शक्ति से भय उत्पन्न करना अनिवार्य हो जाता है। वात्सल्य योजना के परिप्रेक्ष्य में देखें तो शायद सिस्टम भी सरकार की तरफ से ऐसे ही संदेश का इंतजार कर रहा है। देश में कोरोना अब तक लाखों व्यक्तियों का जीवन निगल चुका है। प्रदेश में यह महामारी 6797 व्यक्तियों की जान ले चुकी है। यह आंकड़ा कुल मरीजों के दो फीसद से भी ज्यादा है। कई बच्चों से तो इस बीमारी ने अभिभावक ही छीन लिए। ऐसे अनाथ बच्चों के लिए सरकार मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना लेकर आई है। सरकार की मंशा इन बच्चों की मदद करने की है, मगर यह मंशा विभागों के बीच फुटबाल की तरह धक्के खा रही है। सोचिए, जब अधिकारी सरकार की घोषणा से ही वात्सल्य नहीं दिखा रहे तो अनाथ हुए बच्चों पर किस प्रकार कृपा बरसाएंगे।

ग्रीन बोनस की मांग को मिलेगी मजबूती

71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड के लिए बीता रविवार ज्येष्ठ में शीतलता लेकर आया। एक तरफ पर्यावरण दिवस था, जो देवभूमि की हरियाली को और घना कर गया। दूसरी तरफ हम सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की तर्ज पर सकल पर्यावरणीय उत्पाद (जीईपी) प्रणाली लागू करने वाला प्रथम राज्य बन गए। उम्मीद है, अब इससे राज्य की सालाना पर्यावरणीय सेवा का सही-सही मोल लग पाएगा। सकल पर्यावरणीय उत्पाद का लेखा-जोखा ग्रीन बोनस की डगर भी आसान कर सकता है। अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग के एक अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड हर वर्ष देश को तकरीबन 95 हजार करोड़ रुपये मूल्य की पर्यावरणीय सेवा प्रदान करता है। जिसकी कीमत प्रदेश को विकास को सीमित कर चुकानी पड़ रही है। इसकी भरपाई के लिए बीते 20 वर्ष से ग्रीन बोनस की मांग की जा रही है। अब पर्यावरणीय सेवाओं का विज्ञानी आधार तैयार होने से प्रदेश की इस मांग को मजबूती मिलेगी।

बस रिपोर्ट दिखाओ, फर्जी है तो क्या

कोरोना की दूसरी लहर पर काबू पाने के लिए सरकार ने पूरे तंत्र को झोंक रखा है। सख्त आदेश है कि राज्य में किसी भी व्यक्ति को बगैर आरटीपीसीआर रिपोर्ट के प्रवेश नहीं मिलेगा। इस आदेश का बखूबी पालन भी हो रहा है। मगर, इस बात की फिक्र किसी को नहीं कि जो रिपोर्ट लेकर लोग पहुंच रहे हैं, वह सही है भी या नहीं। अगर सिस्टम इसको लेकर संजीदा होता तो ऋषिकेश के ढालवाला कोविड चेकपोस्ट पर चल रहा रिपोर्ट का फर्जीवाड़ा कैबिनेट मंत्री के निरीक्षण में नहीं पकड़ा जाता। साफ है कि सरकार के प्रयास को साकार करने के लिए कुछ अधिकारी भले दिन-रात का भेद भूलकर जुटे हों, मगर कुछ अब भी एसी कमरों का मोह नहीं त्याग पा रहे। ऐसे ही साहबों की 'मेहर' से फर्जी आरटीपीसीआर रिपोर्ट बनाने का खेल चल रहा है। यह खेल उत्तराखंड के लिए कभी भी घातक साबित हो सकता है।

राहत देती है जागरूकता की यह तस्वीर

कहीं पढ़ा था कि नारी नर की खान है। कहने का आशय यह कि भले ही नारी ने संसार को गढ़ा न हो, मगर यह गढ़ उसी का है। इसकी संचालक वही है। उसके बिना जीवन की कल्पना फिलहाल तो असंभव ही है। देवभूमि को यह बात समझ आ गई है। इसी का नतीजा है कि राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात में लगातार सुधार हो रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 2019-20 में जन्म के समय लिंगानुपात 949 पहुंच गया। सारांश यह कि एक हजार बालकों पर अब इतनी बालिकाओं का जन्म हो रहा है। इससे पहले 2017-18 में यह आंकड़ा 922 था, जो 2018-19 में थोड़ा और सुधरकर 938 हो गया था। यह जागरूकता देखकर भान होता है कि भविष्य में प्रदेश को बेटी-बेटा एक समान, बेटी है तो कल है और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे स्लोगन की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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Edited By: Raksha Panthri