राज्य ब्यूरो, देहरादून। Uttarakhand Chunav 2022 उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी चुनने में व्यस्त राजनीतिक दल अंदरखाने दलबदल की आशंका से सहमे हुए भी हैं। अगले कुछ दिनों में प्रत्याशियों की घोषणा के बाद भाजपा और कांग्रेस में टिकट से वंचित नेताओं के दल बदलने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसीलिए दोनों दलों ने ऐसे नेताओं को अपने पाले में रोके रखने की रणनीति भी तैयार की है। चुनाव नतीजों के बाद सरकार बनने की स्थिति में ऐसे नेताओं को सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा दिया जा रहा है।

कुछ महीने पहले शुरू हो चुका सिलसिला

विधानसभा चुनाव से पहले निष्ठा बदलकर दूसरे दल में शामिल होने का सिलसिला कुछ महीने पहले उत्तराखंड में शुरू हो चुका है। भाजपा के दो विधायक यशपाल आर्य व उनके पुत्र संजीव आर्य कांग्रेस में वापस लौटे तो कांग्रेस के विधायक राजकुमार ने भाजपा में वापसी की। दो निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पंवार व राम सिंह कैड़ा भी भाजपा में शामिल हुए। अब जबकि सभी दल प्रत्याशी चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, एक बार फिर दलबदल की आशंका ने राजनीतिक दलों को बेचैन कर दिया है।

दलबदल के मोर्चे पर भाजपा की चुनौती बड़ी

भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों में प्रत्याशियों की घोषणा के बाद बड़े पैमाने पर दलबदल से इन्कार नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि टिकट न मिलने से नाराज नेता चुनाव मैदान में उतरने के लिए अन्य दलों का रुख कर सकते हैं। दलबदल के मोर्चे पर भाजपा के चुनौती अधिक बड़ी मानी जा रही है। इसका कारण यह है कि पिछली बार भाजपा ने 70 में से 57 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पार्टी अपने विधायकों के कार्यकाल का आकलन लगातार करा रही है। पिछले छह महीनों के दौरान कई स्तर पर सर्वे कराए गए हैं। सर्वे में कसौटी पर खरा न उतरने वाले विधायकों के टिकट पार्टी काट सकती है।

कांग्रेस के पास खोने को अधिक नहीं, फिर भी अंदेशा

हालांकि अब संभावना यह दिख रही है कि सशक्त दावेदार न मिलने से टिकट से वंचित विधायकों का आंकड़ा कम रहेगा, लेकिन जिनके टिकट कटेंगे, उनके पाला बदलने की आशंका भी भाजपा को है। इसके अलावा पूर्व विधायक और अन्य वरिष्ठ नेता, जो इस बार चुनाव लड़ना चाहते हैं, उन्हें मौका न मिलने की स्थिति में भी दलबदल हो सकता है। कांग्रेस की बात की जाए तो उसके पास खोने के लिए बहुत अधिक नहीं है। उसके सभी विधायकों के टिकट लगभग तय हैं। इसके बावजूद पार्टी के अलग-अलग धड़ों से जुड़े नेता प्रत्याशी न बनाए जाने की स्थिति में दल बदल करें तो आश्चर्य नहीं होगा।

सत्ता में हिस्सेदारी का दिया जा रहा भरोसा

भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दल इस संभावित स्थिति से निबटने की तैयारी भी कर रहे हैं। टिकट के प्रबल दावेदार, जिन्हें मौका नहीं मिलेगा, उन्हें सत्ता में आने की स्थिति में सरकार व संगठन में महत्वपूर्ण पदों का आश्वासन अभी से दिया जा रहा है। ऐसी पहले भी होता आया है। विभिन्न आयोगों, परिषदों, निगमों में सरकार अपरी पार्टी के नेताओं की नियुक्ति करती है। इनके अध्यक्ष व उपाध्यक्षों को मंत्री पद का दर्जा व अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। इनके सदस्यों को भी निश्चित धनराशि मानदेय के रूप में दी जाती है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से अब तक हुए चारों विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने ऐसा ही किया है।

दावेदारी को लेकर दोनों दलों में घमासान

टिकटों को लेकर भाजपा और कांग्रेस में दावेदारों की कतार खासी लंबी है। एक-एक सीट पर कई नेता अपना दावा पार्टी के समक्ष पेश कर चुके हैं। यद्यपि इनमें से कितनी सीटों पर तोड़फोड़ या दलबदल की नौबत आएगी और कितनों को पार्टी मना लेगी, यह नामांकन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही सामने आ पाएगा।

प्रत्येक जिले में इतनी सीटों पर दो से ज्यादा दावेदार

जिला भाजपा कांग्रेस

पिथौरागढ़ 03 02

अल्मोड़ा 05 03

बागेश्वर 02 01

चम्पावत 02 01

नैनीताल 02 02

ऊधमसिंह नगर 07 07

हरिद्वार 06 05

टिहरी 04 03

उत्तरकाशी 03 02

देहरादून 06 05

पौड़ी 03 03

चमोली 02 01

रुद्रप्रयाग 01 01

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Edited By: Raksha Panthri