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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 28, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

कोरोना का सर्तकता ही सबसे बड़ा निदान, उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने आयोजित किया जागरूकता सप्ताह

By Sunil Singh NegiEdited By:
Published: Mon, 28 Dec 2020 08:05 PM (IST)

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की ओर से आम जनमानस में कोरोना से बचाव को जागरूकता पैदा करने के लिए एक जागरूकता ...और पढ़ें

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने कोरोना से बचाव के लिए एक जागरूकता सप्ताह का आयोजन किया।
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने कोरोना से बचाव के लिए एक जागरूकता सप्ताह का आयोजन किया।

जागरण  संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की ओर से आम जनमानस में कोरोना से बचाव को जागरूकता पैदा करने के लिए एक जागरूकता सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है। जिसके तहत विवि के कुलपति प्रो. सुनील जोशी ने मुख्य परिसर से जागरूकता रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। जोगीवाला, विधानसभा, रिस्पना पुल, आराघर, दर्शन लाल चौक, पुलिस मुख्यालय, सचिवालय, घंटाघर एवं जीएमएस रोड होते हुए यह रैली आइएसबीटी पहुंची। जहां लोगों को औषधि व जागरूकता सामग्री वितरित की गई। 

कुलपति ने कहा कि कोरोना से बचाव के लिए सबसे जरुरी है जागरूकता। सर्तकता ही सबसे बड़ा निदान है। उन्होंने कहा कि जरा सी लापरवाही घातक हो सकती है। इसलिए सही ढंग से मास्क पहनें, अच्छे से हाथ धोएं और शारीरिक दूरी का पालन करें। अपनी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए नियमित रूप से योग व व्यायाम करें और खानपान पर पूरा ध्यान दें। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के तीनों परिसर व 16 संबद्ध कॉलेजों को इस जागरूकता अभियान से जोड़ा गया है। 

इस दौरान एंबुलेंस के जरिए चिकित्सा विशेषज्ञ दल आयुर्वेदिक औषधियां, औजस कवाथ, मास्क, जागरूकता सामग्री का निश्शुल्क वितरण करेंगे। साथ ही आयुर्वेद छात्रों ने कोरोना वायरस से बचाव के लिए स्लोगन भी तैयार किए हैं। इस अवसर पर उप कुलसचिव डॉ. पीके गुप्ता,कार्यक्रम संयोजक डॉ. नरेश चौधरी, कुलपति के निजी सचिव चंद्रमोहन पैन्यूली, परिसर निदेशक प्रो. आरबी सती, डॉ. दीपक सेमवाल, डॉ. नवीन जोशी आदि उपस्थित रहे। 

उधर, कुलपति के निर्देश पर हरिद्वार में भी जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। यह रैली चंद्राचार्य चौक, ज्वालापुर, कनखल, हरकी पैड़ी, भीमगोडा एवं सप्तऋषि व नेपाली फॉर्म होते हुए डोईवाला में समाप्त हुई। 

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