देहरादून, जेएनएन। यूं तो कुत्ते को सबसे वफादार जानवर माना जाता है लेकिन अगर यह वफादारी भूल जाए तो खतरा जानलेवा हो सकता है। हम बात कर रहे हैं कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी रेबीज की। सबसे ज्यादा मुसीबत का सबब बने हुए हैं स्ट्रीट-डॉग यानी आवारा कुत्ते। बात राजधानी दून की करें तो ऐसा कोई भी गली और मोहल्ला नहीं जहां आवारा कुत्तों का आतंक न हो। 

शाम ढलने के बाद शहर के गली-मोहल्लों में पैदल या दुपहिया पर निकलना खतरे से खाली नहीं। शाम से रात का समय तो खतरनाक है ही दोपहर में भी कुत्ते बच्चों को निशाना बनाने से नहीं चूक रहे। शिकायतों के बावजूद नगर निगम इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। न तो कुत्तों की नसबंदी हो रही, न ही इन्हें कहीं छोड़ा जा रहा। शनिवार को भी कुत्तों ने स्कूल जा रही मासूम बच्ची को निशाना बनाया।

घटना शहरी क्षेत्र में पिछले साल शामिल हुए डोईवाला के ग्रामीण क्षेत्र केशवपुरी में एक स्थानीय मजदूर की दस वर्षीय बच्ची शनिवार सुबह घर के समीप प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जा रही थी। इसी दौरान वहां रास्ते में खड़े एक आवारा कुत्ते ने बच्ची के पांव पर हमला कर दिया। बच्ची जान बचाकर भागी भी, लेकिन कुत्ते ने उसका पांव नोंच लिया।

 चीख-पुकार सुनकर ग्रामीणों ने उसे बचाया और प्राथमिक अस्पताल ले गए पर वहां वैक्सीन नहीं मिली। पिता किसी तरह उसे निजी अस्पताल ले गए और बामुश्किल वैक्सीन का इंतजाम किया। वहीं बात शहर के अस्पतालों की करें तो यहां रोजाना कुत्तों के काटने के औसतन बीस से तीस मामले सामने आ रहे हैं। अकेले दून अस्पताल में ही औसतन 15 मामले रोजाना सामने आते हैं। 

हर तीन माह में एंटी रेबिज वैक्सीन की तीन हजार डोज मंगाई जाती है, लेकिन इन दिनों वैक्सीन न तो अस्पताल में उपलब्ध है और न ही बाजार में। वहीं, आवारा कुत्तों पर लगाम लगाने के लिए नगर निगम फेल साबित हो रहा है। स्थिति ये है कि शहर में तमाम कालोनियों में शाम ढलते ही आवारा कुत्ते आतंक मचाते हैं। इस कारण लोग घर से बाहर जाने में डरने लगे हैं। नगर निगम के पास कुत्तों की नसबंदी या उन्हें पकड़ने की कोई ठोस योजना ही नहीं है। दूनवासी आएदिन निगम में शिकायत लेकर पहुंचते हैं और मायूस होकर लौट जाते हैं। बताया जा रहा कि एक दिन पूर्व शिमला बाइपास पर भी एक बच्ची को आवारा कुत्ते ने नोंच दिया था।

डॉ. अनिल आर्य (चर्म रोग विशेषज्ञ) का कहना है कि एक सर्वे के मुताबिक प्रतिवर्ष भारत में करीब बीस हजार लोगों की मौत कुत्तों या अन्य जानवर के काटने से रेबीज के चलते होती है। रेबीज जानलेवा बीमारी है। इससे बचाव जरूरी है। ऐसे में जानवर के काटने पर तत्काल डॉक्टर से संपर्क करें। सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज वैक्सीन मुफ्त दी जाती है। मरीज को चार बार वैक्सीन देते हैं। घरेलू उपाए जैसे मिर्च, चूना, मिट्टी और पट्टी बांधने से रेबीज का खतरा बढ़ सकता है।

सुनील उनियाल गामा (महापौर)  का कहना है कि आवारा कुत्तों को लेकर नगर निगम का एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर संचालित हो रहा है। यहां करीब 30 हजार कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है। जिन इलाकों में शिकायतें हैं, वहां टीम भेजकर दिखवाया जाएगा और आवारा कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी कराई जाएगी।

शहर में करीब 50 हजार कुत्ते

नगर निगम के सूत्रों के अनुसार, शहर में करीब 50 हजार आवारा कुत्ते हैं। प्रभावित इलाकों में कौलागढ़, एमडीडीए कालोनी, डालनवाला, अधोईवाला, करनपुर, पलटन बाजार, केवल विहार, नालापानी, रेसकोर्स, वसंत विहार, आर्यनगर, देहराखास, विद्या विहार, नारायण विहार, कारगी, भंडारी बाग, आदर्श विहार, तिलक रोड, खुड़बुड़ा, वसंत विहार व पटेलनगर आदि मुख्यत: शामिल हैं।

.तो देहरादून शहर में केवल 65 पालतू कुत्ते

सुबह या शाम सैर को आप कहीं भी निकल जाइए, पूरे शहर में आपको गले में चेन व पट्टा बांधे घूम रहे पालतू कुत्तों पर आपकी नजर पड़ जाएगी। ये गंदगी फैलाते हुए भी दिखेंगे, गुर्राते हुए भी व सड़क पर नित्यक्रिया करते हुए भी लेकिन नगर निगम को शायद ये नहीं दिखते। शहर में भले ही इनकी संख्या हजारों में होगी लेकिन निगम प्रशासन की मानें तो शहर में महज 65 ही पालतू कुत्ते हैं। नगर निगम से 65 लाइसेंस ही जारी हुए हैं और इन्हीं का सालाना सौ रुपये शुल्क भी अब तक लिया जा रहा है। यही नहीं, शहर में आवारा कुत्तों, सूअर व अन्य पशुओं का भी निगम के पास रेकार्ड नहीं है। तीन साल पहले नगर निगम द्वारा पालतू पशुओं के पंजीकरण को लेकर शहर में अभियान चलाने का दावा जरूर किया गया था, लेकिन वक्त के साथ ये दावा भी हवा में गुम हो गया। इतना ही नहीं आवारा पशुओं के पंजीकरण शुल्क को भी दोगुना किया गया था और जुर्माने का प्रावधान भी किया गया, लेकिन तीन साल में निगम की ओर से एक भी कार्रवाई नहीं की गई।

एबीसी से कम नहीं हुई मुश्किलें 

कुत्तों से निजात दिलाने के लिए निगम ने 2017 में एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर तो शुरू किया लेकिन इससे भी मुश्किलें कम नहीं हुई। केदारपुरम में नगर निगम का अस्पताल बनाया गया लेकिन यहां की व्यवस्थाओं पर हमेशा सवालिया निशान लगता रहा है। दो साल में 40 हजार कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य रखा गया था, जो 30 हजार भी बड़ी मुश्किल से होने का दावा किया जा रहा है।

नहीं दिखती नगर निगम की टीम

शहर में आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए निगम की ओर से आउटसोर्स पर बाकायदा टीम रखी हुई है। टीम को दो वाहन भी दिए हुए हैं, लेकिन यह टीम कहीं नजर नहीं आ रही। पार्षद कई दफा महापौर से इस संबंध में शिकायत कर चुके हैं, लेकिन अधिकारी कुछ करने को राजी नहीं।

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Posted By: Sunil Negi

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