डा. प्रणव पंड्या। स्वाधीनता आंदोलन में आध्यात्मिक विभूतियों का अमूल्य योगदान रहा है। युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य ऐसे ही महान आध्यात्मविद्, दार्शनिक व योगी थे जिन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पुनरुत्थान में तो अहम भूमिका निभाई ही, स्वाधीनता के परम साधक के रूप में भी सक्रिय रहे...

डा. प्रणव पंड्या

आचार्य श्रीराम शर्मा के जीवन पर दृष्टिपात करते ही यजुर्वेद के नवें अध्याय की 23वीं कंडिका में वर्णित श्लोक ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ साकार हो उठता है। इसका अर्थ है ‘हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे’। आचार्य श्रीराम शर्मा आधुनिक युग के ऐसे मनीषी, ऋषि व युगदृष्टा थे, जिनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रदेव की सच्ची आराधना को समर्पित रहा।

अदम्य साहस का परिचय

26 जनवरी, 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस की घोषणा के बाद आगरा में जन आंदोलन उफान पर था। सत्याग्रहियों का एक जत्था तिरंगा थामे आगरा से 40 किलोमीटर दूर जरार में आंदोलनरत था। इसी बीच अंग्रेज सिपाही सत्याग्रहियों पर डंडे बरसाने लगे। भगदड़ मच गई मगर एक तरुण सत्याग्रही अंग्रेज सिपाहियों की पिटाई व भगदड़ से बेखौफ ‘भारत माता की जय’का उद्घोष करता आगे बढ़ रहा था। उस युवक के अदम्य साहस को देख सभी अचंभित थे। इसके बाद उस युवक का उपनाम ‘मत्तजी’ यानी ‘आजादी के मतवाले’ पड़ गया। वह युवा कोई और नहीं, बल्कि आगरा के आंवलखेड़ा गांव में 20 सितंबर, 1911 को पं. रूप किशोर व दानकुंवरी देवी के घर जन्मे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य थे। 1927-1933 तक वे सक्रिय आंदोलनकारी के रूप में सतत् रहे। कालांतर में अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक-संरक्षक, गायत्री के सिद्ध साधक, युग निर्माण योजना के सूत्रधार व 21वीं सदी के उज्ज्वल भविष्य के उद्घोषक के रूप में प्रसिद्ध हुए।

पत्रकारिता से जगाई आजादी की अलख

स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष भागीदारी के साथ ही वे श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल के संपादन में आगरा से प्रकाशित पत्र ‘सैनिक’ में लेखन व संपादन का कार्य बड़ी कुशलता से करते रहे। उनकी क्रांतिकारी रचनाएं न सिर्फ ‘सैनिक’, बल्कि ‘प्रताप’ और दैनिक ‘विश्वामित्र’ में भी नियमित रूप से छपती थीं। उनकी रचनाओं ने जहां स्वतंत्रता सेनानियों का मनोबल बढ़ाया, वहीं द्रुतगति से क्रांति की ज्वाला भी भड़काई। उनकी रचनाएं दैनिक ‘सैनिक’ में ‘मत्त प्रलाप’ शीर्षक से प्रकाशित होती थीं।

युग साहित्य का सृजन

स्वतंत्रता आंदोलन को ताकत देने व युग परिवर्तन के लिए गुरु के निर्देश पर आचार्य जी ने गायत्री तपोभूमि मथुरा व युग तीर्थ शांतिकुंज की स्थापना की और लोकमानस के परिष्कार को विविध साधनात्मक सत्रों का शुभारंभ किया। वे साहित्य साधना में भी अनवरत लगे रहे। वर्ष 1938 से धर्म-अध्यात्म के वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने मासिक पत्रिका ‘अखंड ज्योति’ की शुरुआत की। उनकी जलाई ज्ञान की अखंड ज्योति आज भी जल रही है। उनके द्वारा सृजित 3,200 पुस्तकें जीवन के हर पहलू को प्रकाशित करती हैं।

आचार्य का स्वराज दर्शन

आचार्य का स्पष्ट मत था कि स्वराज सिर्फ राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्वराज के बिना राजनीतिक स्वराज अपूर्ण है। अस्तु इन सभी स्तरों पर स्वराज प्राप्त करना ही पूर्ण स्वराज है। उनका मानना था कि जब तक समाज ऊंच-नीच, दहेज प्रथा, बाल विवाह, भिक्षा व्यवसाय, भ्रष्टाचार, नशा जैसी समस्याओं, कुरीतियों व कुप्रभावों की जंजीरों में जकड़ा है, तब तक उसे मुक्त समाज नहीं कहा जा सकता। इन कुप्रचलनों से भरी भ्रांतियों को तभी हटाया-मिटाया जा सकता है, जब दुर्बुद्धि को रोकने वाला जनांदोलन खड़ा हो। अपनी पुस्तक ‘शिक्षा और विद्या’ में वह लिखते हैं कि शिक्षा वही सार्थक है जो मनुष्य को सभ्य व सुसंस्कृत बनाए। पाश्चात्य के बजाय स्वदेशी शिक्षा पद्धति कहीं अधिक श्रेयस्कर है। हरिद्वार में स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय आचार्य के इन्हीं शैक्षणिक दर्शनों का साकार रूप है।

गिराईं जाति-संप्रदाय की दीवारें

सामाजिक-सांस्कृतिक स्वराज का शंखनाद तो आचार्य ने उसी दिन कर दिया था, जब सामाजिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपने गांव की ही अछूत मानी जाने वाली कुष्ठ रोग पीड़ित दलित महिला की सेवा स्वयं की। साथ ही एक दलित के घर में सत्यनारायण की कथा भी कराई। बाद के वर्षों में तो उनके द्वारा दुनिया के कोने-कोने में आयोजित विराट गायत्री महायज्ञ व अश्वमेध यज्ञों में जाति-संप्रदाय की दीवारें लगातार ढहती गईं। आचार्य ने सभी श्रेष्ठ आदर्शों को अपने आचरण से प्रस्तुत किया। उनके लिए राष्ट्रधर्म सदैव सर्वोपरि रहा।

(लेखक अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं)

Edited By: Sunil Negi