स्मार्टफोन का 'अदृश्य हाथ', कैसे एल्गोरिदम बच्चों की सोच और मानसिक स्वास्थ्य को कर रहा है प्रभावित?
देहरादून में एक बच्ची के अनुभव से पता चलता है कि कैसे स्मार्टफोन एल्गोरिदम बच्चों की सोच और मानसिक स्वास्थ्य ...और पढ़ें
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HighLights
स्मार्टफोन एल्गोरिदम बच्चों की सोच और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत सरकार बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सख्त नियम बना रही है।
प्लेटफॉर्म, अभिभावक, स्कूल और सरकार मिलकर समाधान खोजें।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देहरादून में एक चार साल की बच्ची अपने पिता का स्मार्टफोन अनलॉक करती है, यूट्यूब खोलती है और शॉट्स (Shorts) स्क्रॉल करना शुरू कर देती है। एक वीडियो में बेकिंग सिखाई जा रही है, दूसरे में रिश्तों पर सलाह दी जा रही है, इसके बाद निवेश के टिप्स और फिर राशिफल विश्लेषण आता है।
उसी शाम, खाने की मेज पर वह बच्ची अचानक सवाल पूछकर घर के सभी लोगों को चौंका देती है, पापा, एक बार में मर जाना अच्छा है या रोज घुट-घुट के मरना? दुनिया भर के करोड़ों बच्चों के लिए अब इंटरनेट सिर्फ ऐसी जगह नहीं रह गया है जहाँ वे कुछ खोजें और उन्हें मिल जाए। वे आगे क्या देखेंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उन्होंने पहले क्या देखा, किस पर क्लिक किया या किस वीडियो पर रुके रहे।
हर स्वाइप, ऑटोप्ले और अंतहीन स्क्रॉल (Infinite Scroll) के पीछे एक रिकमेंडेशन सिस्टम (एल्गोरिदम) काम करता है, जिसे यूजर्स को जोड़े रखने के लिए डिजाइन किया गया है। नीति, विवाद और सुरक्षा के उपाय भारत सरकार बच्चों की सुरक्षा के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर सोशल मीडिया के पूर्ण प्रतिबंध के बिना सख्त नियमों पर विचार कर रही है[।
हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर बंटे हुए हैं कि सरकार को रिकमेंडेशन एल्गोरिदम, इनफिनिट स्क्रॉलिंग और ऑटोप्ले जैसे फीचर्स को किस सीमा तक विनियमित करना चाहिए। यह बहस अमेरिकी अदालतों तक भी पहुंची है, जहां मेटा (Meta) ने बच्चों में लत और नुकसान पहुंचाने से जुड़े दावों के चलते 18 अरब डॉलर तक का भुगतान करने पर सहमति जताई है।
साथ ही, मेटा ने किशोरों के लिए कई सुरक्षा उपाय लागू किए हैं, जैसे दैनिक 2 घंटे की सीमा। आधी रात से सुबह 6 बजे तक एक्सेस ब्लॉक करना। स्कूल के घंटों के दौरान नोटिफिकेशन म्यूट करना। सख्त आयु-सत्यापन (Age-verification) उपाय। आंतरिक शोध और मानसिक स्वास्थ्य पर असर यह चिंता नई नहीं है।
2021 में लीक हुए मेटा के आंतरिक दस्तावेजों से खुलासा हुआ था कि कंपनी के शोधकर्ताओं ने खुद पाया था कि इंस्टाग्राम ने पहले से बॉडी इमेज की समस्या से जूझ रही 32% किशोर लड़कियों में इस चिंता को और बढ़ा दिया। शोध में यह भी पाया गया कि किशोरों ने इंस्टाग्राम के इस्तेमाल को सामाजिक तुलना, चिंता, अवसादग्रस्तता की भावना और खुद के इस्तेमाल पर नियंत्रण न रख पाने की समस्या से जोड़ा।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में 'डिजिटल फ्यूचर्स फॉर चिल्ड्रन सेंटर' की निदेशक प्रोफेसर सोनिया लिविंगस्टोन का कहना है कि बच्चों को यह चुनने का अधिकार होना चाहिए कि एल्गोरिदम उन्हें क्या रिकमेंड करे।
उनका कहना है, सूचना परिदृश्य को नियंत्रित करना बच्चों और मानवाधिकारों के खिलाफ है, खासकर तब जब यह नियंत्रण मानवीय हितों के बजाय व्यावसायिक हितों से संचालित होता है। मेटा के प्रवक्ता ने TOI को बताया कि कंपनी 13+ आयु सीमा के हिसाब से किशोरों के लिए डिफ़ॉल्ट सुरक्षा सेटिंग्स दे रही है, जिससे उनके कंटेंट और मैसेजिंग पर नियंत्रण बना रहे।
हालांकि, ऑटोप्ले और बैक-टू-बैक रिकमेंडेशन जैसे फीचर्स पर उठ रहे सवालों पर मेटा ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। भारत के समक्ष अनूठी चुनौतियाँ बाल अधिकार शोधकर्ता शालिनी अरविंदन के अनुसार, कोविड के बाद स्मार्टफोन की आसान पहुंच ने बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। माता-पिता की निगरानी में कमी और साझा डिवाइस के इस्तेमाल से यह समस्या और जटिल हो जाती है।
जैसे पिता के यूट्यूब उपयोग के हिसाब से बच्चे को भी वही कंटेंट रिकमेंड होने लगता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को सिंगापुर (डिजिटल साक्षरता व सामुदायिक जागरूकता), वियतनाम (उपयोगकर्ता सत्यापन व अवैध सामग्री हटाने के सख्त नियम) और फिलीपींस (18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए टारगेटेड विज्ञापनों पर रोक) के मॉडलों से सीख लेनी चाहिए। पारदर्शिता और साझा जिम्मेदारी इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के पूर्व कार्यकारी निदेशक प्रतीक वाघरे का कहना है कि सिर्फ प्लेटफॉर्म्स ही इस समस्या को हल नहीं कर सकते।
इसके लिए प्लेटफॉर्म्स, माता-पिता, स्कूलों और सरकार को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने हानिकारक कंटेंट को हटाने के समय में कमी लाने और प्लेटफॉर्म्स में अधिक पारदर्शिता की वकालत की। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जब तक ठोस डिजिटल नीतियाँ और सुरक्षात्मक एल्गोरिदम फ्रेमवर्क लागू नहीं होते, तब तक केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि रोकथाम, जागरूकता और स्वतंत्र ऑडिट ही असली समाधान हैं।
