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शोध में सामने आई चौंकाने वाली बात, बारिश का वेग नहीं झेल पा रहे उत्तराखंड के पहाड़; इन दो शहरों को ज्‍यादा खतरा

वाडिया संस्थान के विज्ञानियों ने वर्ष 1880 से 2020 के बीच हुई भूस्खलन की घटनाओं का अध्ययन कर भारी वर्षा से इसका सीधा संबंध बताया है। बता दें कि भूकंप के लिहाज से राज्य अतिसंवेदनशील जोन चार व पांच में है।

By Suman semwalEdited By: Nirmala BohraPublished: Sat, 25 Mar 2023 11:17 AM (IST)Updated: Sat, 25 Mar 2023 11:17 AM (IST)
जब भी राज्य में वर्षा अधिक हुई है, भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं।

सुमन सेमवाल, देहरादूनः यह किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड भौगोलिक और पर्यावरणीय लिहाज से अति संवेदनशील हैं। यहां की जमीन ग्लेशियरों के पीछे खिसकने से छूटे मलबे से बनी है। भूकंप के लिहाज से राज्य अतिसंवेदनशील जोन चार व पांच में हैं। बादल फटने की घटनाएं भी परेशानी का सबब बनी रहती हैं।

भारी वर्षा में राज्य में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ जाती हैं। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान का अध्ययन बता रहा है की जब भी राज्य में वर्षा अधिक हुई है, भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं।

वाडिया संस्थान के विज्ञानियों ने वर्ष 1880 से 2020 के बीच हुई भूस्खलन की घटनाओं का अध्ययन कर भारी वर्षा से इसका सीधा संबंध बताया है।

बढ़ रही हैं बादल फटने की घटनाएं

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा विक्रम गुप्ता के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के रूप में वर्षा का मिजाज भी बदला है। कई बार कम समय के लिए ही सही, लेकिन तीव्र वेग से वर्षा हो रही है। इसके साथ ही बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

ऐसी स्थिति में पहले से कमजोर भूगर्भीय स्थिति वाले उत्तराखंड के पहाड़ तेजी से दरक रहे हैं। नैनीताल, मसूरी रोड, पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, यमुना वैली, अलकनंदा वैली, मंदाकिनी, भागीरथी नदी क्षेत्र, टिहरी (बूढाकेदार), नीलकंठ महादेव क्षेत्र (पौड़ी) भूस्खलन की दृष्टि से अधिक संवेदनशील हैं।

मसूरी व नैनीताल का विशेष जिक्र

अध्य्यन में वाडिया संस्थान के विज्ञानियों ने नैनीताल व मसूरी क्षेत्र के भूस्खलन जोन का विशेष उल्लेख किया है। विज्ञानियों ने बताया कि जब भी इन दोनों शहरों में सामान्य से ढाई से करीब साढ़े तीन गुना अधिक वर्षा हुई, यहां भूस्खलन की घटनाएं अधिक देखने को मिली हैं।

अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में निर्माण में सावधानी जरूरी

वाडिया के अध्ययन के बाद अब सरकारी एजेंसियों को बड़ी परियोजनाओं के निर्माण से पहले वर्षा के रिकार्ड जरूर देख लेने चाहिए। ताकि वर्षा के हिसाब से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में परियोजनाओं में आवश्यक सावधानी बरती जा सके।

अधिक वर्षा और भूस्खलन की स्थिति

  • क्षेत्र/भूखलन, भूस्खलन वर्ष, कारण, प्रभाव
  • नैनीताल, 1880, भारी वर्षा, 151 व्यक्तियों की मौत
  • कैलाखान(नैनीताल), 1898, भारी वर्षा, 29 व्यक्तियों की मौत
  • मध्यमेश्वर(रुद्रप्रयाग), 1962, भारी वर्षा, कई व्यक्तियों की मौत
  • तवाघाट(पिथौरागढ़) 1977, भारी वर्षा, 44 व्यक्तियों की मौत
  • ज्ञानसू(उत्तरकाशी) 1980, भारी वर्षा, 45 व्यक्तियों की मौत
  • नीलकंठ मार्ग(ऋषिकेश) 1990, भारी वर्षा, 100 तीर्थयात्रियों की मौत
  • ऊखीमठ(रुद्रप्रयाग), 1998, बादल फटा, 101 व्यक्तियों की मौत
  • मालपा (पिथौरागढ़), 1997, भारी वर्षा, 211 व्यक्तियों की मौत
  • कैलास मानसरोवर मार्ग(पिथौरागढ़), 1998, भारी वर्षा, 169 तीर्थयात्रियों की मौत
  • फाटा(रुद्रप्रयाग), 2001, भारी वर्षा, 27 व्यक्तियों की मौत
  • बूढाकेदार(टिहरी), 2002, बादल फटा, 29 व्यक्तियों की मौत
  • वरुणावत(उत्तरकाशी), भारी वर्षा, 900 घर क्षतिग्रस्त
  • केदारनाथ आपदा (रुद्रप्रयाग), भारी वर्षा, 5000 से अधिक व्यक्तियों की मौत
  • बलिया नाला(नैनीताल), 2013, भारी वर्षा, सैकड़ों लोग प्रभावित
  • चाइना पीक(नैनीताल), 2020, भारी वर्षा, पहाड़ी का बड़ा भाग खिसका
  • दून-मसूरी रोड, 2020, भारी वर्षा, सड़क ध्वस्त

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