यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 31, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
पौष्टिकता और औषधियों से भरी हैं उत्तराखंड की ये दालें, खूब खाइये और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाइये
उत्तराखंड का खान-पान भी पौष्टिकता से परिपूर्ण है। बात यदि पहाड़ी दालों की करें तो राजमा गहथ तोर उड़द काले ...और पढ़ें

जागरण संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराएं तो समृद्ध हैं ही साथ ही यहां का खान-पान भी पौष्टिकता से परिपूर्ण है। बात यदि पहाड़ी दालों की करें तो राजमा, गहथ तोर, उड़द, काले भट, रयांस, छीमी, लोबिया आदि औषधीय गुणों से भरपूर है।
बदलते मौसम के हिसाब से इन दालों को उपयोग में लाया जाता है। ये दालें जैविक होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। यही कारण है कि देशभर में पहाड़ी दालों की डिमांड लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड सरकार के प्रयास से महिला स्वयं सहायता समूहों और संगठनों को जहां बाजार मिल रहा है, वहीं पारंपरिक खेती को भी बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि काश्तकारों को उनकी पैदावार का बेहतर मूल्य मिल सके।
आयुर्वेदाचार्य डा. जेएन नौटियाल बताते हैं कि पहाड़ी दालें हाई प्रोटीन वैल्यू होने के साथ ही यह रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाती हैं। काले भट में प्रोटीन की प्रचुर मात्रा होती है। वहीं, गहथ की दाल की तासीर गर्म होती है जो गुर्दे की पथरी के उपचार में बेहद फायदेमंद होती है। प्रोटीन, फाइबर की मात्रा बढ़ाने के लिए पहाड़ी दालें उपयोग की सलाह दी जाती है।
गथवाणी और तोर का सूप पीने से सर्दी होगी दूर
सर्दियों के मौसम में गथवाणी (उबले गहथ से बनी दाल) और तोर का सूप पीना बेहद फायदेमंद होता है। इससे सर्दी दूर हो जाती है। इसके अलावा उत्तराखंड में काले, भूरे और सफेद भट की छह प्रजातियां मिलती हैं। जिसे विशेषतौर पर इस मौसम में दाल, चटनी के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
हर्षिल, चकराता, जोशीमठ व मुनस्यारी की राजमा का जलवा
उत्तराखंड के हर्षिल, चकराता, जोशीमठ और मुनस्यारी की राजमा आज पूरे देश में मशहूर है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में इसकी डिमांड बढ़ रही है। ये राजमा स्वाद में तो लाजवाब है ही साथ ही पौष्टिक भी हैं। इसके अलावा हल्के पीले और सफेद रंग के लोबिया या सूंठा की दाल में अन्य दालों के मुकाबला फाइबर अधिक मिलता है।
बढ़ रही जागरूकता, मिल रहा बाजार
सुभाष रोड स्थित महिला हथकरघा बुनकर समूह में पहाड़ी उत्पादों के विक्रेता नीलम बताती हैं कि पहाड़ी उत्पादों में विशेषतौर पर दालों की खरीदारी अधिक हो रही है। पहले सिर्फ पहाड़ के लोग ही इन विभिन्न गुणों से भरपूर दालों को लेते थे, लेकिन जागरूकता बढऩे से अन्य लोग भी इसको खरीदने लगे हैं, जिससे पहाड़वासियों की आर्थिकी तो मजबूत हो ही रही साथ ही इन उत्पादों को बाजार भी मिल रहा है। उन्होंने बताया कि काला भट 120, सोयाबीन 100, छेमी 200, गहथ 200, तोर 300, सूंठा (लोबिया) 150 रुपये प्रतिकिलो तक बिक रहा है।
सरकार से मिले पारंपरिक फसलों पर समर्थन मूल्य
बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता द्वारिका प्रसाद सेमवाल बताते हैं कि पहाड़ में खेती पर उत्पादन कम हो रहा है। जिस कारण मांग के अनुरूप अनाज पैदा नहीं हो पा रहा है। सरकार को पारंपरिक फसलों के लिए समर्थन मूल्य देना चाहिए। बताया कि संस्था की ओर से प्रदेशभर में बीज दान अभियान चलाया जा रहा है। लोग को बीज के लिए भटकना न पड़े इसके लिए उत्तरकाशी में बीज बैंक बनाने का कार्य किया जा रहा है।
