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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 13, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

उत्तराखंड में नए कलेवर में निखरेगा मौनपालन, पैदा होंगे रोजगार के नए अवसर

By Sunil NegiEdited By:
Published: Sat, 13 Nov 2021 06:16 PM (IST)

उत्तराखंड में मौनपालन नए कलेवर में निखरेगा। इससे राज्‍य में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। साथ ही किसानों की ...और पढ़ें

उत्‍तराखंड में मौनपालन (मधुमक्खी पालन) को नए कलेवर में निखारने की तैयारी है।
उत्‍तराखंड में मौनपालन (मधुमक्खी पालन) को नए कलेवर में निखारने की तैयारी है।

राज्य ब्यूरो, देहरादून। जैवविविधता के मामले में बेहद धनी उत्तराखंड में अब स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ ही छोटे-छोटे उद्यमों की स्थापना पर सरकार ने ध्यान केंद्रित किया है। इसी कड़ी में मौनपालन (मधुमक्खी पालन) को नए कलेवर में निखारने की तैयारी है। अभी तक ज्यादातर शहद उत्पादन के लिए ही मौनपालन किया जाता रहा है, लेकिन अब इसे बी-पोलन समेत अन्य उत्पादों पर भी फोकस किया जाएगा। इस पहल से राज्य में रोजगार के नए अवसर सृजित होने के साथ ही कृषि के साथ-साथ किए जाने वाले मौनपालन से किसानों की आय दोगुना करने में भी मदद मिलेगी।

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में मौनपालन परंपरागत ढंग से घरों मे होता रहा है, लेकिन वहां इसे लेकर मैदानी क्षेत्रों की भांति व्यवसायिक सोच विकसित नहीं हो पाई थी। वह भी तब जबकि पहाड़ में मौनपालन से मिलने वाले शहद की मांग बहुत अधिक है। यही नहीं, मैदानी क्षेत्रों में शहद उत्पादन के लिए मौनपालन हो रहा है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो प्रदेशभर में प्रतिवर्ष 1600 मीट्रिक टन शहद उत्पादित होता है। इसमें लगभग 300 टन की भागीदारी देशी मधुमक्खियों से मिलने वाले शहद की है, जबकि शेष यूरोपियन अथवा अन्य प्रजातियों की मधुमक्खियों से।

अब मौनपालन को आर्थिकी का बड़ा जरिया बनाने की तैयारी है। सरकार पहले ही प्रत्येक न्याय पंचायत में मधु ग्राम बनाने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। साथ ही मौनपालन से जुड़े व्यक्तियों को मौन बाक्स आदि उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब मौनपालन को नए कलेवर में निखारने के मद्देनजर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इसके तहत मौनपालन को न सिर्फ शहद बल्कि अन्य उत्पादों से जोड़ा जा रहा है।

निदेशक उद्यान डा एचएस बावेजा के अनुसार मौनपालन के लिए उत्तराखंड में परिस्थितियां मुफीद हैं। उन्होंने बताया कि मधुमक्खियों से सिर्फ शहद ही नहीं, बल्कि अन्य कई उत्पाद भी मिलते हैं। मौनपालन से मिलने वाला बी-पोलन तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार है। उन्होंने कहा कि मौनपालन के बहुआयामी उपयोग को देखते हुए इसी हिसाब से रणनीति तैयार की जा रही है। इसके तहत मौनपालकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था के साथ ही उन्हें नवीन तकनीकी से लैस किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विभाग का प्रयास है कि आने वाले दिनों में शहद उत्पादन के क्षेत्र में उत्तराखंड आत्मनिर्भर बन सके।

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