शहर के ज्यादातर इलाकों में पेयजल की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं है। कहीं पानी में टीडीएस (टोटल डिजॉल्व सॉलिड) की मात्रा मानक से कहीं अधिक है, कहीं क्लोरीन की मात्रा ज्यादा और कहीं क्लोरीन पूरी तरह गायब है। फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा शून्य होनी चाहिए, लेकिन उसकी उपस्थिति भी पेयजल में पाई गई है।

स्पेक्स (सोसाइटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट्स) के सचिव डॉ. बृजमोहन शर्मा कहते हैं कि यदि पानी में टीडीएस की मात्रा 1500 भी हो, मगर उसमें कैल्शियम-मैग्नीशियम के बाईकार्बोनेट की मात्रा अधिक नहीं है तो उससे नुकसान नहीं होगा। जबकि, दून में यह मात्रा सीमा से अधिक होने के चलते पानी की हार्डनेस नुकसानदेह है। इससे दिल संबंधी बीमारी, अस्थमा, त्वचा रोग, त्वचा पर झुर्रियां जल्दी आना, पथरी की शिकायत, एसिडिटी, मधुमेह, अल्जाइमर आदि की समस्या होती है।

अपने शहर को शानदार बनाने की मुहिम में शामिल हों, यहां करें क्लिक और रेट करें अपनी सिटी 

इसके अलावा पानी में क्लोरीन की अधिकता से ब्लड कैंसर, शरीर की कोशिकाओं को क्षति, नाक-कान, आंख और छाती रोग आदि की समस्या हो रही है, जबकि कॉलीफॉर्म के कारण पेट के रोग, डायरिया, हेपेटाइटिस, पीलिया जैसे रोग जकड़ रहे हैं।

बीमारी की जड़ को खत्म कीजिए
डॉ. बृजमोहन शर्मा कहते हैं कि हमारे यहां हेल्थकेयर का मतलब कोई बीमार हो जाए तो उसकी देखरेख करने को माना जाता है। सही मायने में सबसे पहले ध्यान प्रिवेंटिव हेल्थकेयर यानी सावधानियां बरतने पर जाना चाहिए। साफ पानी, साफ हवा और पोषण पर ध्यान दिया जाए तो अस्पताल खोलने और इलाज का खर्च बहुत हद तक कम हो जाता है। 

स्वस्थ मनुष्य को हर दिन कम से कम 12 गिलास शुद्ध जल ग्रहण करना चाहिए। कई लोगों की नजर में पानी की शुद्धता जरूरी नहीं होती। लेकिन, आपकी यह सोच आपके और आपके परिवार की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। नहाने से लेकर पीने के पानी तक की शुद्धता मायने रखती है। अशुद्ध पानी से त्वचा संबंधी और अन्य कई तरह की बीमारियों को न्योता मिलता है।

आंकड़ों की मानें, तो पीने के पानी में लगभग 2100 विषैले तत्व मौजूद होते हैं। लिहाजा, बेहतरी इसी में है कि पानी का इस्तेमाल करने से पहले इसे पूरी तरह से शुद्ध कर लिया जाए, क्योंकि सुरक्षा में ही सावधानी है। अगर आप रोगनिरोधी उपाय अपनाते हैं तो इससे एक बहुत बड़ी समस्या हल हो सकती है। मुश्किल यह है कि इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा और स्वास्थ्य का खर्च बढ़ रहा है।

हर 20 सेकंड में बचाई जा सकती है एक बच्चे की जान
डॉ. शर्मा कहते हैं कि स्वच्छ पेयजल के अभाव में प्रतिवर्ष होने वाली बीमारियों के उपचार पर कई करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। डब्ल्यूएचओ के 2012 के आंकड़ों के अनुसार, प्रत्येक वर्ष पांच वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु में 11 प्रतिशत मृत्यु डायरिया के कारण होती हैं।

इस अनुमान को ध्यान में रखते हुए स्वच्छ पेयजल और बेहतर सफाई व्यवस्था मुहैया कराई जाए, तो हरेक 20 सेकेंड में एक बच्चे की जान बचाई जा सकती है। साथ ही, तेजी से बढ़ती शिशु मृत्युदर को घटाया जा सकता है। सरकारी तंत्र को इस तरफ गंभीरता से सोचने की जरूरत है। यदि मात्र शुद्ध पेयजल की उपलब्धता नागरिकों को करा दी जाए तो बीमारियों पर होने वाले खर्च को 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

बीमारी की दस्तक पर जागृत होते हैं जिम्मेदार
डॉ. बृजमोहन शर्मा कहते हैं कि आज से कई साल पहले एक विभाग बना था मलेरिया विभाग, जिसके जिम्मे मच्छर से निपटने का काम था। तब दीवारों पर एक स्लोगन लिखा दिखता था, न मच्छर रहेगा, न मलेरिया रहेगा। थोड़े दिनों बाद वहां लिखना शुरू हुआ मच्छर तो रहेंगे, पर मलेरिया नहीं रहेगा। मलेरिया पीछे छूट गया और अब डेंगू, स्वाइन फ्लू जैसी कई बीमारियां नई चुनौती खड़ी कर रही हैं। कुछ ऐसे वायरल हैं, जिनका नाम भी बहुत कम सुना है।

दरअसल, सफाई अभियान में लोगों की अरुचि, सरकारी तंत्र की सुस्ती, सफाई के लिए जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता, समन्वय की कमी और ऐसे ही तमाम कारण हैं, जिसने हमें कई नई बीमारियों की जद में ला दिया है। एक दिक्कत यह भी है कि अधिकतर समय विभाग इसे लेकर सुप्तावस्था में रहते हैं। स्थिति विकराल होने लगती है तब शुरू होती है भागदौड़। अभी दो साल पहले डेंगू को लेकर यही हुआ। इस बीमारी पर हाहाकार मचा और तब जाकर सरकारी तंत्र जागृत हुआ।

इसी तरह स्वाइन फ्लू को भी काफी वक्त हल्के में लिया जाता रहा। इस प्रवृति में बदलाव की जरूरत है। इसके लिए पूर्व नियोजित कदम उठाए जाने चाहिए। एक बात और, डेंगू, स्वाइन फ्लू आदि की जांच के विकल्प अब भी सीमित हैं। डेंगू के मामलों में एलाइजा जांच केवल एक दून मेडिकल कॉलेज में ही होती है। स्वाइन फ्लू की जांच की सरकारी अस्पताल में व्यवस्था ही नहीं है। इसके सैंपल दिल्ली भेजे जाते हैं। इसकी रिपोर्ट आते-आते ही सप्ताह भर का वक्त लग जाता है।

आपसी समन्वय पर रहे फोकस
डॉ. बृजमोहन शर्मा के अनुसार कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के मामले में यह बात एकदम सटीक है। यह किसी एक की नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। हम जब जलजनित रोगों की बात करते हैं तो जल संस्थान की भी उतनी जिम्मेदारी बनती है जितनी स्वास्थ्य महकमे की। इसी तरह डेंगू को लेकर नगर निगम का भी बराबर दायित्व है। यही नहीं विभागों के आपसी समन्वय का भी अहम रोल है। उस पर लोग भी यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि यह सरकार या फलां विभाग की जिम्मेदारी है। एक साथ ही तमाम चुनौतियों से पार पाया जा सकता है।

दूषित जल के दुष्प्रभाव
- विषाणु: पीलिया, पोलियो, गैस्ट्रो-इंटराइटिस, जुकाम, चेचक
- जीवाणु: अतिसार, पेचिश, मि
यादी बुखार, अतिज्वर, हैजा, कुकुर खांसी, सूजाक, उपदंश, जठरांत्र, शोथ, प्रवाहिका, क्षय रोग
- प्रोटोजोआ: पायरिया, पेचिस, निद्रा रोग, मलेरिया, अमिबियोसिस रुग्णता, जियार्डियोसिस रुग्णता
- कृमि: फाइलेरिया, हाइड्रेटिड सिस्ट रोग और पेट में विभिन्न प्रकार के कृमि का आ जाना।

पानी की स्वच्छता का संकल्प
डॉ. बृजमोहन शर्मा विगत 25 वर्षों से सबके लिए विज्ञान की परिकल्पना को यथार्थ रूप देने के लिए समर्पित हैं। उन्होंने तकनीकी का सरलीकरण कर निरंतर आम जनमानस तक उसे पहुंचाने का प्रयास किया। इसके फलस्वरूप उन्होंने 'स्पैक्स' संस्था का गठन किया। इस संस्था ने देश के 25 राज्यों के 50 लाख जनमानस तक विज्ञान और तकनीकी को पहुंचाकर आत्मनिर्भर बनाने का काम प्रशस्त किया।

खास बात यह कि उनकी संस्था पानी की गुणवत्ता और खाद्य पदार्थों की मिलावट को लेकर भी लगातार मुहिम छेड़े हुए है। वह लगातार पानी और खाद्य पदार्थों की सैंपलिंग और टेस्टिंग कर आमजन को सेहत के प्रति जागृत करने का काम कर रहे हैं। 

- डॉ. बृजमोहन शर्मा, सचिव, सोसाइटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एन्वायरमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट्स

By Nandlal Sharma