सुकांत ममगांई, जागरण संवाददाता

बदलते वक्त के साथ बेहतरीन आबोहवा की पहचान रखने वाले देहरादून की फिजां भी मौसम के लिहाज से बदली है। इसी के साथ बढ़ा है बीमारियों का दायरा। हालांकि, सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र तक स्वास्थ्य सेवाएं अवश्य बढ़ी हैं, लेकिन इनका मूल्यांकन करने पर तीन प्रमुख स्तरों पर कमियां नजर आती हैं। इन्हें दूर करना एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौतियां स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, गुणवत्ता, और कीमत के मोर्चो पर हैं। कारण यह है कि स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने से लेकर इसकी पहुंच तक, पारंपरिक तौर पर स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा कुछ बिखरे स्वरूप में नजर आता है।

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सुधारनी होंगी सरकारी सेवाएं

दून के हेल्थ सिस्टम का ठीक ढंग से आकलन करना है तो उसे दो भागों में विभक्त करना होगा। निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा। पहले बात सरकारी अस्पतालों की, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के बाद के स्तर की सेवाओं की कमी है। बीमारी जटिल होने पर रोगी को किसी प्राइवेट अस्पताल रेफर करना आम बात है। रात के वक्त तो सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी में जाना, व्यर्थ भटकने जैसा ही है।

यही नहीं, सुविधाओं के स्तर पर भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। शहर का प्रमुख अस्पताल दून चिकित्सालय बूढ़ी मशीनों का भार ढो रहा है। यहां जब-तब कोई न कोई मशीन खराब रहती है। ऐसे में लोगों की भीड़ प्राइवेट लैब की तरफ जाने को मजबूर होती है। उस पर कभी दवा का संकट और कभी अन्य सामान की दिक्कत। अल्ट्रासाउंड तक के लिए गर्भवती महिलाओं को कई-कई दिन इंतजार करना पड़ता है। शहर के अन्य सरकारी अस्पतालों कोरोनेशन, प्रेमनगर अस्पताल, नेत्र चिकित्सालय, रायपुर अस्पताल का सूरतेहाल भी इससे जुदा नहीं है।

इधर कुआं, उधर खाई

दूसरी तरफ बड़े या कॉरपोरेट अस्पतालों में उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं जरूर हैं, पर गरीब जनता में इतना सामर्थ्य नहीं कि इनका रुख कर सके। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बावजूद एक बड़ा वर्ग अब भी स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं से अछूता है। उपचार के लिए महंगे खर्च को लोग विवश हैं और गरीब मरीजों के लिए 'इधर कुआं उधर खाई' जैसे हैं।

बुनियादी ढांचे पर हो जोर

व्यवस्था में सुधार के लिए स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना समय की मांग है। निजी-सार्वजनिक भागीदारी के तहत सस्ते इलाज की पहल की जा सकती है। स्वास्थ्य बीमा इसमें एक आदर्श भूमिका निभा सकता है। स्वास्थ्य बीमा का विस्तार कर स्वास्थ्य पर लोगों के खर्च को घटाया जा सकता है। सरकार पोषित बीमा योजनाओं में केवल अस्पताल में भर्ती होने का खर्च ही दिया जाता है। रोगियों को ओपीडी में काफी रकम खर्च करनी पड़ती है। इस ओर ध्यान देना होगा। यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज आज की आवश्यकता बन गई है। 

एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली जरूरी 

खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, कूड़ा निष्पादन एवं स्वास्थ्य बंदोबस्त से संबंधित एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का अभाव बीमारियों के बोझ का प्रमुख कारण है। नतीजतन संक्रामक एवं पुराने रोग बदस्तूर कायम हैं। ऐसे में सभी को साथ लेकर साथ चलने की आवश्यकता है। प्रिवेंटिव हेल्थ पर भी हमें समान रूप में कार्य करना होगा। सस्ती जेनरिक दवा को अस्पतालों में जन औषधि केंद्र खोले गए हैं, पर डॉक्टर अब भी ब्रांडेड का मोह नहीं छोड़ पा रहे। लिहाजा, ऐसा तंत्र विकसित करने की दरकार है, जो इस नियम का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराए। 

शुल्क में भारी असमानता
निजी क्षेत्र के शुल्क में भारी असमानता है। कोई नई बीमारी जब महामारी का रूप लेती है तो उसकी जांच के नाम पर लोगों की जेब पर कैंची चलती है। हाल में डेंगू के प्रकोप के दौरान यह दिखा भी। हर अस्पताल में भर्ती होने से लेकर ओपीडी चार्ज तक में भिन्नता है। अस्पतालों को सुविधाओं के लिहाज से वर्गीकृत भी करें तब भी इसमें असमानता दिखती है। 

क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट पर बने एक राय
ऐसे में हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को तो सुदृढ़ करना ही होगा निजी क्षेत्र पर भी नियंत्रण की आवश्यकता है। प्रदेश में क्लिनिकल एस्टेबलिश्मेंट एक्ट आए करीब दो साल बीत चुके हैं, पर यह लागू अब तक नहीं हो सका है। इसके जरिये रोगी के पंजीकरण, उपकरणों एवं सेवाओं की गुणवत्ता, अस्पताल-प्रबंध संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन, शिकायतों पर ध्यान देकर उनका निवारण का प्रबंध एवं रोगी के अधिकारों की यथाचित सुरक्षा जैसे विषयों को नियंत्रण में लाया जा सकता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को एक्ट के कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्ति है और इसे लेकर कई दौर की वार्ता हो चुकी है। जरूरत इस बात की है कि इस पर जल्द एक राय बने।

तोड़ना होगा एजेंटों का मायाजाल

सरकारी अस्पतालों में कथित एजेंटों का सिंडिकेट भी तेजी से फैल रहा है। यह लोग मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते हैं। उसके रेफर होने पर बहला फुसलाकर किसी एक अस्पताल में छोड़ देते हैं, जहां उसका आर्थिक शोषण होता है। इस सिंडिकेट को ध्वस्त करना होगा।

सहभागिता से दूर होंगी दिक्कतें

सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। मसलन कार्डियोलॉजिस्ट, मनोरोग विशेषज्ञ, नेफ्रोलॉजिस्ट, ओंकोलॉजिस्ट, न्यूरो सर्जन की दिक्कत लगातार बनी है। निजी क्षेत्र की सहभागिता से यह दूर हो सकती है। बड़े अस्पतालों से अनुबंध के तहत यह डॉक्टर सप्ताह में कुछ दिन सरकारी अस्पताल में ओपीडी कर सकते हैं। सर्जरी आदि का खर्च स्वास्थ्य बीमा योजना में वहन किया जा सकता है।

इसके अलावा डायलिसिस यूनिट, आइसीयू, ट्रॉमा सेंटर, बर्न यूनिट आदि सेवाओं का भी विस्तार किया जाना चाहिए। 

धार्मिक संगठनों से सहयोग
शहर में कई धार्मिक स्थलों में साधारण बीमारियों के इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र चल रहे हैं। यहां बीमारियों से संबंधित जांच भी सस्ती दर पर कराई जा सकती है। छोटी-मोटी बीमारियों के लिए यहां पर डॉक्टर भी मौजूद रहते हैं। धार्मिक संगठनों के पास आर्थिक संसाधन भी हैं। लिहाजा, इन संगठनों का सहयोग आमजन को सस्ता इलाज मुहैया कराने को लिया जा सकता है।

By Nandlal Sharma