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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 17, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

उत्‍तराखंड: डबल इंजन से ऊर्जा प्रदेश की उम्मीदों को पंख

By Sunil NegiEdited By:
Published: Fri, 17 Mar 2017 12:38 PM (IST)Updated: Sat, 18 Mar 2017 04:00 AM (IST)

उत्‍तराखंड के 'डबल इंजन' से जुड़ने के बाद 'ऊर्जा प्रदेश' की उम्मीदों को पंख लगे हैं। सूबे की 39 पनबिजली परियोजनाएं पर्यावरण समेत तमाम कारणों से अटकी पड़ी हैं।

उत्‍तराखंड: डबल इंजन से ऊर्जा प्रदेश की उम्मीदों को पंख
उत्‍तराखंड: डबल इंजन से ऊर्जा प्रदेश की उम्मीदों को पंख

देहरादून, [अंकुर त्यागी]: देवभूमि के 'डबल इंजन' से जुड़ने के बाद 'ऊर्जा प्रदेश' की उम्मीदों को पंख लगे हैं। सूबे की 39 पनबिजली परियोजनाएं पर्यावरण समेत तमाम कारणों से अटकी पड़ी हैं तो बहुद्देश्यीय लखवाड़ परियोजना की वित्तीय स्वीकृति भी केंद्र के स्तर पर लंबित है। चुनाव प्रचार के दौरान देहरादून आए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पीयूष गोयल ने भी इस संकट के लिए राज्य सरकार की कमजोर पैरवी को जिम्मेदार ठहराया था।
राज्य गठन के समय सपना बुना गया था कि उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश के रूप में पहचान दी जाएगी। लेकिन, यह सपना आज तक हकीकत में नहीं बदल पाया। स्थिति ये है कि उत्तराखंड को जरूरतभर की बिजली के लिए भी दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। बिजली की कमी से अक्सर ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में कटौती होती है। सूबे की मांग के सापेक्ष एक तिहाई बिजली ही राज्य की परियोजनाओं से मिल पाती है।
कारण, राज्य बनने के बाद से आज तक एक भी नई पनबिजली परियोजना शुरू नहीं हो सकी। एक तरफ ईको सेंसटिव जोन में 15 परियोजना फंसी हैं तो दूसरी ओर 2013 की आपदा के बाद 24 परियोजनाओं के निर्माण पर रोक लगा दी गई। यमुना घाटी में प्रस्तावित 300 मेगावाट की लखवाड़ बहुद्देश्यीय परियोजना का निर्माण भी केंद्र सरकार से वित्त की मंजूरी नहीं मिलने के कारण शुरू नहीं हुआ। जबकि, तीन महीने पहले उत्तराखंड जल विद्युत निगम इसका शिलान्यास कर चुका है। 
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय का है विरोध
उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण का विरोध केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय कर रहा है। भागीरथी ईको सेंसटिव जोन में फंसी 68 मेगावाट की 10 छोटी पनबिजली परियोजनाओं को मंजूरी मिलने की उम्मीद थी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट कमेटी ने अनुमति पर विचार करने का आश्वासन दिया था। लेकिन, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने पेंच फंसा दिया। मंत्रालय का कहना है कि परियोजनाओं से पर्यावरण को नुकसान होगा। 
वहीं, आपदा के बाद 24 परियोजनाओं में से सार्वजनिक उपक्रम की पांच बिजली परियोजनाओं से रोक हटने की उम्मीद भी जल संसाधन मंत्रालय के विरोध के चलते परवान नहीं चढ़ी। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था, जिसमें वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त उपाय और आपात प्रबंधन योजना की शर्त जोड़ी गई थी। इन परियोजनाओं के शुरू होने से रॉयल्टी के रूप में उत्तराखंड को 102.50 मेगावाट बिजली मिलेगी। 
लेकिन, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में परियोजनाओं को नदी की सेहत और पर्यावरण के लिए खतरनाक बताया था। अब केंद्र के साथ राज्य में भी भाजपा सरकार होने से इन अड़चनों के दूर होने की उम्मीद है। जल विद्युत निगम के प्रबंध निदेशक एसएन वर्मा का कहना है कि पैरवी में तेजी लाएंगे। उम्मीद है कि जल्द अच्छे परिणाम मिलेंगे। 
16 साल में पांच गुणा बढ़ी मांग
राज्य गठन से अब तक सूबे में बिजली की खपत पांच गुणा बढ़ चुकी है, जबकि उपभोक्ताओं की संख्या में दोगुने से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई। कोई नई पनबिजली परियोजना नहीं जुड़ने के कारण बिजली उत्पादन में महज 30 फीसद की ही बढ़ोत्तरी हुई है। 
वर्ष 2001-02, 2016-17
उपभोक्ता, 841113, 2086823
बिजली मांग, 2229, 10935 (मिलियन यूनिट)
ये है स्थिति 
-जल विद्युत निगम की 1284 मेगावाट की 13 परियोजनाएं हैं। 
-इनसे से औसतन 13 मिलियन यूनिट प्रतिदिन बिजली मिलती है। 
-राज्य की बिजली मांग औसतन 36 मिलियन यूनिट प्रतिदिन है। 
-शेष बिजली का इंतजाम केंद्रीय पूल, लांग-शार्ट टर्म करार और बाजार से करना पड़ता है।