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किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना: डूबने वाली जमीन का जमीन पर होगा हिसाब, की जाएगी डिजिटल मैपिंग

Published: Sat, 19 Sep 2026 10:25 AM (IST)

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना की प्रस्तावित झील में डूबने वाली निजी, राजस्व और वन भूमि का विस्तृत भौतिक सर्वेक्षण शुरू हो गया है।

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राज्य ब्यूरो, देहरादून। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना की प्रस्तावित झील में कितनी जमीन डूबेगी, कौन सा खसरा प्रभावित होगा व डूब क्षेत्र में कितनी संपत्तियां व संरचनाएं आएंगी, इसका अब जमीन पर पूरा हिसाब तैयार करने की कवायद शुरू कर दी गई है।

किशाऊ कारपोरेशन लिमिटेड ने उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में डूब क्षेत्र की निजी, राजस्व और वन भूमि का धरातल पर विस्तृत भौतिक सर्वेक्षण कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मौके पर वास्तविक स्थिति का सत्यापन करने के साथ खसरा आधारित नक्शों का डिजिटलीकरण किया जाएगा। इसके बाद डूब क्षेत्र का विस्तृत डिजिटल नक्शा तैयार होगा।

उत्तराखंड जल विद्युत निगम के एमडी एके सिंह ने बताया कि सर्वे में केवल जमीन की पैमाइश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डूब क्षेत्र में आने वाली सभी संपत्तियों और संरचनाओं को भी चिह्नित किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि परियोजना की प्रस्तावित झील की जद में कौन सा खसरा, कितनी भूमि और कौन-कौन सी संपत्तियां आ रही हैं। जमीन की वास्तविक स्थिति को डिजिटल रिकार्ड में दर्ज करने से आगे की प्रक्रिया के लिए भी विस्तृत आधार तैयार होगा।

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उत्तराखंड में यह सर्वे देहरादून जिले की चकराता और त्यूणी तहसीलों में कराया जाना है। वहीं, हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले की शिलाई और शिमला जिले की चौपाल तहसील में डूब क्षेत्र का सर्वे होगा। उत्तराखंड में सर्वे कार्य की अनुमानित लागत 19.90 लाख रुपये और हिमाचल प्रदेश में 19.99 लाख रुपये रखी गई है।

बिजली से लेकर पानी तक का मिलेगा लाभ

किशाऊ परियोजना के संशोधित स्वरूप में 422 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रस्तावित है। चार इकाइयों में प्रत्येक की क्षमता 105.5 मेगावाट होगी। परियोजना से 1324 मिलियन घन मीटर उपयोगी पानी उपलब्ध कराने का भी प्रविधान है। इसमें हरियाणा को 633, उत्तर प्रदेश को 411, राजस्थान को 124, दिल्ली को 80, हिमाचल प्रदेश को 42 और उत्तराखंड को 34 मिलियन घन मीटर पानी का हिस्सा प्रस्तावित है।

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