जागरण संवाददाता, देहरादून। पवित्र कैलास भूक्षेत्र का जितना सांस्कृतिक महत्व है, इसका उतना ही पर्यावरणीय व सामाजिक महत्व भी है। हालांकि, उच्च हिमालय के इस समूचे क्षेत्र में तमाम दुश्वारियां भी हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु विषम भौगोलिक परिस्थितियों का सामना कर कैलास मानसरोवर की यात्रा करते हैं। यहां तमाम भूस्खलन जोन हैं और पवित्र भूक्षेत्र में जो लोग निवास करते हैं, उनके सामने तमाम पर्यावरणीय चुनौतियां पेश आती रहती हैं। हालांकि, कैलास भूक्षेत्र को विश्व धरोहर का दर्जा मिल जाने के बाद इस क्षेत्र का संरक्षण होगा और चुनौतियों को कम किया जा सकेगा।

भविष्य की उम्मीद को साकार करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान के विज्ञानी यूनेस्को सेंटर कैटेगरी-दो (प्राकृतिक धरोहर) के माध्यम से प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं। यूनेस्को की सहमति के बाद प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। साथ ही काम अहम काम में संस्कृति मंत्रालय के साथ पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन व विदेश मंत्रालय भी सहयोगी की भूमिका में हैं। चूंकि पवित्र कैलास भूक्षेत्र चीन व नेपाल में भी पड़ता है, लिहाजा यह दोनों देश भी मिलकर काम कर रहे हैं।  

कैलास भूक्षेत्र तीनों देशों को मिलाकर कुल 31 हजार 252 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर फैला है। भारतीय हिस्से वाले 7120 वर्ग किलोमीटर की बात करें तो यहां 518 भूस्खलन क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं। इसके अलावा यह भी पता चला है कि यहां वन क्षेत्र भी घट रहे हैं। राज्य में इसरो की नोडल एजेंसी के रूप में काम कर रहे उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) की सेटेलाइट मैपिंग यह बात सामने आई।

यूसैक की सेटेलाइट मैपिंग के अनुसार, पवित्र भूक्षेत्र में बसे 36 गांव सीधे तौर पर इससे प्रभावित हैं, जबकि 196 गांव भूस्खलन के 200 मीटर के दायरे में और 227 गांव 500 मीटर के दायरे में आ रहे हैं। ज्यादातर गांव सीमांत पिथौरागढ़ जिले में मुन्स्यारी व धारचूला ब्लॉक के हैं। वहीं, इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में जैवविविधता के लिहाज से खड़ी हो रही चुनौती की बात करें तो 83 वर्ग किलोमीटर भाग वनाग्नि की चपेट में रहता है और 109 वर्ग किलोमीटर हिस्से पर वनस्पतियों की शत्रु प्रजाति लैंटाना व कालाबांसा से प्रभावित है। इस तरह कुल मिलाकर 258.72 वर्ग किलोमीटर भाग किसी न किसी रूप से बेहद संवेदनशील माना गया है। लिहाजा, विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि कैलास भूक्षेत्र को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद इन चुनौतियों का जिम्मा यूनेस्को अपने हाथ में लेगा और विश्व की तमाम एजेंसियों व प्रचलित कानून के मुताबिक संरक्षण के कार्य किए जाएंगे। 

इन अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत होगा संरक्षण (क्षेत्र के लिहाज से कुछ प्रमुख संधि)

-इंटरनेशनल प्लांट प्रोटेक्शन कन्वेंशन (1951)

-कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इंडेंजर्ड स्पिसीज ऑफ वाइल्ड फॉना एंड फ्लोरा (1973)

-कन्वेंशन ऑन द कंजर्वेशन ऑफ माइग्रेटरी स्पिसीज ऑफ वाइल्ड एनिमल्र्स (1979)

-कन्वेंशन ऑफ बायलॉजिकल डायवर्सिटी (1992)

-युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (1992)

-इंटरनेशनल ट्रीटी ऑन प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज फॉर फूड एंड एग्रीकल्चर (2001)

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