जौनसार बावर में पहले नहीं मनाया जाता था करवाचौथ, अब सुहागनें रखने लगीं पिया के नाम का व्रत
जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में अब युवा पीढ़ी करवाचौथ का व्रत उत्साह से मना रही है, जो पहले यहां की ...और पढ़ें

फाइल फोटो

समय कम है?
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राहुल चौहान, जागरण चकराता। जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में बदलाव की बयार चल रही है। पहले यहां पर महिलाएं करवाचौथ पर्व नहीं मनाती थी, लेकिन पिछले कुछ साल से जौनसार बावर में करवाचौथ के प्रति क्रेज तेजी से बढ़ा है।
नयी पीढ़ी की अधिकांश सुहागिनें करवाचौथ पर्व मना रही हैं और अपने पिया के नाम की मेहंदी लगाकर व्रत रख रही हैं, हालांकि बुजुर्ग पीढ़ी को इस पर्व में कोई दिलचस्पी नहीं है, वह आज भी अपनी संस्कृति के रीति रिवाजों से चिपकी हुई हैं।
समय के साथ बदलती जीवनशैली, शिक्षा, रोजगार और दूसरे क्षेत्रों के लोगों से बढ़ते संपर्क का असर अब जौनसार-बावर की संस्कृति पर भी दिख रहा है। क्षेत्र में दूसरे इलाकों के पर्व-त्योहार धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहे हैं। करवाचौथ इसका एक उदाहरण है।
यह पर्व पारंपरिक रूप से जौनसार-बावर की संस्कृति का कभी हिस्सा नहीं रहा, लेकिन अब युवा दंपती इसे मनाने लगे हैं। करवाचौथ के प्रति क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि युवा सुहागिनें पर्व को अपने पारंपरिक वेशभूषा में ही सज संवर कर मना रही हैं।
पर्व मनाने वाली महिलाओं ने बताया कि दूसरे राज्यों और उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में नौकरी करने वाले युवाओं तथा वहां रहने वाले परिवारों में इस पर्व को लेकर उत्साह देखा जा रहा है।
दूसरे क्षेत्रों की सामाजिक परंपराओं से जुड़ाव और जीवनसाथी के साथ नए अनुभव साझा करने की इच्छा के चलते जौनसार बावर के दंपती इस पर्व को तेजी से अपना रहे हैं।
इसका असर अब जौनसार बावर के गांवों तक पहुंच गया है। गुरुवार को जौनसार बावर में नयी पीढ़ी की सुहागिनों ने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखा। महिलाओं ने पति के नाम की मेहंदी लगवाई।
सजी संवरी। सोलह श्रृंगार के साथ महिलाएं सजी धजी दिखाई दी। वैसे तो जौनसार-बावर उत्तराखंड का विशिष्ट जनजातीय क्षेत्र है। यहां की लोकसंस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, लोकगीत, लोकनृत्य, वेशभूषा और पारंपरिक त्योहारों की अपनी पहचान है।
बुजुर्ग दंपती और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़े कई परिवार करवाचौथ को अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा नहीं मानते। उनके लिए स्थानीय त्योहार और रीति-रिवाज सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं।
लेकिन युवा पीढ़ी के शिक्षा और रोजगार के सिलसिले में अपने क्षेत्र से बाहर जाने का असर यह हुआ कि पर्वतीय व मैदानी क्षेत्र के परिवारों के बीच सांस्कृतिक परंपराओं का आदान-प्रदान बढ़ा है।
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