जागरण विमर्श : सड़क सुरक्षा नियमों का नहीं, जीवन बचाने का विषय
उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए विशेषज्ञों ने सड़क सुरक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से ...और पढ़ें

दैनिक जागरण की ओर से आयोजित अकादमिक विमर्श में सड़क दुर्घटनाओं के कारण और उनके बचाव पर बात रखते एम्स गुवाहाटी के अध्यक्ष एवं रोड सेफ्टी एक्टिविस्ट पद्मश्री डा. बीकेएस संजय (बायें) और डा. गौरव संजय (दायें)। वीडियो ग्रैब
HighLights
सड़क सुरक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करें।
उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाओं में 54% मृत्यु दर चिंताजनक।
पहाड़ी भूगोल, मानवीय लापरवाही दुर्घटनाओं के मुख्य कारण हैं।
विजय जोशी, जागरण देहरादून। उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाएं अब केवल परिवहन व्यवस्था की समस्या नहीं रहीं, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी हैं। इन हादसों पर स्थायी रोक के लिए सड़क सुरक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल किए जाने की जरूरत है।
यह बात सोमवार को ‘सड़क सुरक्षा अनुशासन’ विषय पर आयोजित दैनिक जागरण के राज्य स्तरीय अकादमिक विमर्श बतौर विशेषज्ञ मौजूद एम्स गुवाहाटी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन पद्मश्री डा. वीकेएस संजय और आर्थोपेडिक सर्जन एवं रोड सेफ्टी एक्टिविस्ट डा. गौरव संजय ने कहीं।
विशेषज्ञों ने कहा कि यातायात नियमों का पालन करना व्यक्ति डर या जुर्माने से नहीं, बल्कि बचपन से मिले संस्कारों से सीखता है। उन्होंने जोर दिया कि उत्तराखंड में सड़क सुरक्षा- नियमों का नहीं, बल्कि जीवन बचाने का विषय है।
विशेषज्ञ डा. वीकेएस संजय व डा. गौरव संजय ने उत्तराखंड में सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता, उनके पीछे के वास्तविक कारण और उनके व्यावहारिक समाधान पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि देश के मैदानी राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में सड़क हादसे कहीं अधिक घातक साबित हो रहे हैं। देशभर में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में औसतन 33 प्रतिशत मामलों में मृत्यु होती है, जबकि उत्तराखंड में यह आंकड़ा 54 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
इसका अर्थ है कि यहां दुर्घटना होने पर जान बचने की संभावना बेहद कम है। पहाड़ के जटिल भूगोल, सीमित चौड़ाई वाली सड़कों व तीखे मोड़ों पर सावधानी न बरतना, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और समय पर ट्रामा केयर न मिल पाना इसकी बड़ी वजह हैं।
इसके अलावा लापरवाही व शराब पीकर वाहन चलाना, पर्याप्त नींद न लेना, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़, ओवर स्पीड जैसे कारण भी दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
हेलमेट न पहनना व ट्रिपल राइडिंग तो युवाओं का शगल बन चुका है, लेकिन वह यह नहीं जानना चाहते कि यह लापरवाही उनके पूरे परिवार को निराशा के गर्त में धकेल सकती है।
डा. वीकेएस संजय ने कहा कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सड़क सुरक्षा को केवल चालान और नियमों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। यहां व्यवहार में बदलाव और सतत शिक्षा ही सबसे प्रभावी उपाय है।
उन्होंने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल परिवहन विभाग या पुलिस की ही नहीं, बल्कि शिक्षण संस्थान, जनप्रतिनिधि, परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी है। सड़क सुरक्षा को यदि शिक्षा से जोड़ दिया जाए तो सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौत के आंकड़े स्वतः कम हो जाएंगे।
सड़क सुरक्षा : खतरे की जड़ और बचाव की राह
उत्तराखंड में सड़क हादसों के पीछे केवल मानवीय लापरवाही ही नहीं, बल्कि राज्य का पहाड़ी भूगोल भी बड़ी वजह है। संकरी सड़कें, तीखे मोड़, गहरी खाई और अचानक बदलने वाला मौसम दुर्घटनाओं को और घातक बना देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ों में तेज रफ्तार, गलत ओवरटेकिंग और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ही जानलेवा साबित हो रही है। पर्यटन सीजन में बाहरी राज्यों से आने वाले वाहन चालक पहाड़ी मार्गों पर ड्राइविंग की बारीकियों से अनभिज्ञ रहते हैं, जिससे हादसों का खतरा और बढ़ जाता है।
गति सीमा तय हो, सख्ती से हो अनुपालन
विशेषज्ञों ने कहा कि बचाव के लिए जरूरी है कि पहाड़ी सड़कों की प्रकृति के अनुसार गति सीमा तय हो और उसका सख्ती से पालन कराया जाए। दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में क्रैश बैरियर, रिफ्लेक्टर व स्पष्ट चेतावनी संकेत लगाए जाएं।
- विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूल स्तर से सड़क सुरक्षा की शिक्षा अनिवार्य करने से दीर्घकालीन बदलाव संभव है।
इसके साथ ही हेलमेट व सीट बेल्ट को लेकर शून्य सहनशीलता नीति अपनाने और संवेदनशील मार्गों पर त्वरित एंबुलेंस व ट्रामा केयर सुविधाएं मजबूत करने से उत्तराखंड में हादसों एवं मौतों के आंकड़े काफी हद तक कम किए जा सकते हैं।
अस्पताल बताते हैं नियम तोड़ने की कीमत
डा. गौरव संजय ने कहा कि अस्पतालों में भर्ती अधिकांश गंभीर घायलों की स्थिति इस बात की गवाही देती है कि हेलमेट, सीट बेल्ट और नियंत्रित गति जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटनाएं केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से तोड़ देती हैं।
स्कूलों से शुरू हो सड़क सुरक्षा संस्कार
दोनों विशेषज्ञों ने कहा कि यदि बच्चों को स्कूल स्तर पर ही सड़क पार करने के नियम, यातायात संकेतकों की पहचान, पैदल यात्री और साइकिल चालक की जिम्मेदारियां सिखाई जाएं तो आने वाली पीढ़ी अधिक सुरक्षित एवं जिम्मेदार बनेगी। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से इसे जनआंदोलन बनाने की अपील की।
उत्तराखंड में सड़क हादसों के वास्तविक और प्रमुख कारण
- पहाड़ी सड़कों पर निर्धारित गति से अधिक रफ्तार
- मोड़ और ढलानों पर गलत ओवरटेकिंग
- शराब या नशीले पदार्थों के सेवन के बाद वाहन चलाना
- लंबी दूरी की यात्रा में थकान और झपकी (माइक्रो स्लीप)
- रात में कमजोर रोशनी और हाई बीम का गलत प्रयोग
सड़क दुर्घटना होने पर सही और उपयोगी कदम
- वाहन को सुरक्षित स्थान पर रोककर खुद की सुरक्षा सुनिश्चित करें
- घायल को तभी हटाएं जब आग, ट्रैफिक या अन्य खतरा हो
- अधिक रक्तस्राव होने पर सीधा दबाव डालें, घाव न कुरेदें
- तुरंत 108/112 पर काल कर सटीक लोकेशन बताएं
- घायल को पानी या दवा न दें, अनावश्यक हिलाने से बचें
वाहन चालकों के लिए व्यावहारिक और प्रभावी सुरक्षा सुझाव
- हेलमेट व सीट बेल्ट: केवल चालान से बचने के लिए नहीं, बल्कि हर यात्रा में अपनी सुरक्षा के लिए
- गति अनुशासन: सड़क की स्थिति, मौसम और दृश्यता के अनुसार गति रखें
- नशा और ड्राइविंग: शराब पीकर वाहन चलाना अपराध ही नहीं, जानलेवा जोखिम है
- डिस्ट्रैक्शन से बचाव: मोबाइल, इयरफोन और तेज संगीत से दूरी रखें
- रात में ड्राइविंग: लो बीम का सही प्रयोग करें, सामने वाले को चकाचौंध न करें
- बच्चों की सुरक्षा: बच्चों के लिए उम्र के अनुसार सीट और सीट बेल्ट का उपयोग करें
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