देहरादून, [जेएनएन]: 71 फीसद वन भूभाग और इसमें करीब 46 फीसद वनावरण। उस पर हर साल ही करीब एक करोड़ के लगभग पौधों का रोपण। फिर भी हवा में घुलता 'जहर'। वायु प्रदूषण के मामले में उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश की यह तस्वीर चौंकाने वाली है। हवा में प्रदूषण की स्थिति पर उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) की रिपोर्ट पर गौर करें तो सूबे के प्रमुख शहरों में स्थिति संतोषजनक नहीं है। 

2017 में ही एक जनवरी से 31 मार्च के बीच इन स्थानों पर पर्टीकुलेट मैटर यानी पीएम-10 (वातावरण में धूल के कण) का स्तर मानक से कई गुना अधिक दर्ज किया गया। बेहतरीन आबोहवा की पहचान रखने वाले देहरादून में तो स्थिति बेहद खराब है। 

वहां शहर का दिल कहे जाने वाले क्लॉक टावर में ही पीएम-10 मानक से नौ गुना तक अधिक है। 

यही नहीं, देहरादून के अन्य स्थानों के अलावा सूबे के ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर, रुद्रप्रयाग जैसे शहरों में भी बढ़ता वायु प्रदूषण चिंता का विषय बना हुआ है। जानकारों की मानें तो यदि जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में और मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

खतरनाक स्तर पर वायु प्रदूषण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गाइडलाइन के अनुसार पीएम-10 के लिए वार्षिक औसत स्तर 20 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होना चाहिए, जबकि 24 घंटे केलिए इसका स्तर 50 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। वहीं, पीसीबी के मानकों के हिसाब से देखें तो पीएम-10 का वार्षिक औसत 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे के लिए 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होना चाहिए। अगर, डब्ल्यूएचओ के मानकों की बात करें तो उत्तराखंड में औसत ही नहीं बल्कि प्रतिदिन वायु प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। इसी प्रकार पीसीबी के मानक से भी कहीं ज्यादा है प्रदूषण।

यह हैं मुख्य वजह

विशेषज्ञों के मुताबिक पीएम-10 बढ़ने का मुख्य कारण कारखानों से निकलने वाला धुंआ और गंदगी, सड़कों की धूल,  परिवहन का अकुशल मोड, घरेलू ईंधन व अपशिष्ट जल, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, जंगलों में लगने वाली आग, फसल कटने के बाद खेतों में लगाई जाने वाली आग आदि हैं। 

हवा में घुलने वाले प्रदूषण के ये कण मनुष्य के बाल से 30 गुना अधिक महीन होते हैं। गहरी सांस लेने पर प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ये तत्व फेफड़ों तक पहुंचते हैं तो इससे दिल का दौरा, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर व सांस संबंधी रोगों का सबब बन सकते हैं।

वायु प्रदूषण (पीएम-10) की स्थिति (माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर)

स्थान-------------------------2017-----------------2016

घंटाघर (देहरादून)-----------823------------------180.5

रायपुर रोड (देहरादून)-------194------------------245.23

आईएसबीटी (देहरादून)------315------------------288.12

ऋषिकेश-----------------------114------------------117.99

हरिद्वार (सिडकुल)----------120-------------------127.88

हल्द्वानी-----------------------131------------------142.0

काशीपुर------------------------138-------------------129.89

रुद्रप्रयाग-----------------------164-------------------121.10 

कानफोड़ू शोर भी कम नहीं

देहरादून की आबोहवा ही जहरीली नहीं हो रही, बल्कि भीड़ व वाहनों का दबाव बढ़ने से कानफोड़ू शोर भी दुश्वारियां खड़ी कर रहा है। बात चाहे व्यावसायिक क्षेत्र सर्वे चौक की हो अथवा साइलेंस जोन घोषित गांधी पार्क की, सभी जगह ध्वनि प्रदूषण मानक से अधिक है। पीसीबी के मुताबिक औद्योगिक क्षेत्र में दिन में ध्वनि की लिमिट 75 डेसिबल, व्यावसायिक क्षेत्र में 65, आवासीय क्षेत्र में 55 और साइलेंस जोन में 50 डेसिबल से अधिक नहीं होनी चाहिए। दून में आवासीय क्षेत्रों को छोड़ सभी क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण मानकों से कहीं अधिक है।

दून में ध्वनि प्रदूषण (आंकड़े डेसिबल में) 

क्षेत्र------------------2015-----2016-----मानक

सर्वे चौक------------71.0-----74.2-------65

गांधी पार्क-----------52.8-----54.1-------50

घंटाघर----------------74-------74.1-------65

दून अस्पताल--------52-------53.2-------50

सीएमआइ-----------70.10----74.0-------65

रेसकोर्स--------------54.2------55.0-------55

नेहरू कॉलोनी--------53--------55----------55

स्वच्छता के मोर्चे पर फिसला दून 

दून का वातावरण दूषित होने के पीछे एक वजह इस शहर का स्वच्छता के मोर्चे पर फिसलना भी है। सूबे की अस्थाई राजधानी का तमगा मिलने के बाद इस लिहाज से हालात और बिगड़े हैं। अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि 'स्वच्छ भारत मिशन' के तीसरे स्वच्छता सर्वेक्षण में भी दून पिछड़े शहरों की कतार में खड़ा है। सर्वेक्षण में दून को 1900 में से महज 752 यानी 39.57 फीसद अंक ही नसीब हो पाए। 

बता दें कि इस शहर से रोजाना 350 मीट्रिक टन कूड़ा-कचरा निकलता है, मगर उठान हो पाता है 200 से 250 मीट्रिक टन। कूड़े के ढेर यत्र-तत्र बिखरे नजर आते हैं तो जहां इसे डंप किया जाता है, वहां कूड़े के ढेर में आग लगा दी जाती है। इस समस्या के निदान के लिए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट स्वीकृत है, मगर यह कब बनेगा ये सवाल भविष्य के गर्त में छिपा है।

गंगा को छोड़ पीने लायक नहीं अन्य नदियों का पानी

पीसीबी की ओर से नदियों में पानी की गुणवत्ता को लेकर हाल में जो आंकड़े जारी किए, वह चौंकाने वाले हैं। गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा को छोड़ दें तो प्रदेश की किसी भी नदी का जल ऐसा नही है, जो पीने लायक हो। 

इनके जल में कॉलीफार्म की मात्रा इतनी अधिक पाई गई कि यह पीने लायक तो छोडि़ए, नहाने लायक भी नहीं रहा। इसमें चाहे कोसी नदी का पानी हो या धेला नदी का। बेहला, पिलकर, नंधौर, किच्छा, नैनीताल लेक, भीमताल लेक, गौला व कल्याणी नदी को मानकों के हिसाब से पीसीबी ने 'ई' श्रेणी में रखा है। यानी कि इनके पानी का उपयोग केवल सिंचाई में किया जा सकता है।

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Posted By: Sunil Negi

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