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    उत्‍तराखंड: पारिस्थितिकी की सेहत दुरुस्त रहेगी तो आर्थिकी भी संवरेगी, दोनों में सामंजस्‍य है जरूरी

    By Sumit KumarEdited By:
    Updated: Sat, 15 Jan 2022 04:13 PM (IST)

    कोरोनाकाल की सबसे बड़ी सीख यही रही है कि पारिस्थितिकी और आर्थिकी को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। पारिस्थितिकी की सेहत दुरुस्त रहेगी तो इसी के हिसाब से आर्थिकी भी संवरेगी। इसके लिए दोनों में सामंजस्य होना चाहिए।

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    पारिस्थितिकी की सेहत दुरुस्त रहेगी तो इसी के हिसाब से आर्थिकी भी संवरेगी।

    केदार दत्त, देहरादून: कोरोनाकाल की सबसे बड़ी सीख यही रही है कि पारिस्थितिकी और आर्थिकी को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। पारिस्थितिकी की सेहत दुरुस्त रहेगी तो इसी के हिसाब से आर्थिकी भी संवरेगी। इसके लिए दोनों में सामंजस्य होना चाहिए। विषम भूगोल और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड में तो यह आवश्यक भी है। प्रकृति ने मुक्त हाथों से इस पहाड़ी प्रदेश को जल, जंगल, जमीन के रूप में भरपूर प्राकृतिक संसाधन दिए हैं।

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    यह राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इस मामले में कदम-कदम पर उपेक्षा भी हो रही है। विशेषकर, जंगल और विकास के मध्य सामंजस्य का अभाव साफ दिखता है। ऐसे में पर्यावरण पर असर पड़ रहा तो राज्य की विकास यात्रा भी प्रभावित हो रही है। बात समझनी होगी कि जीवन के लिए हवा, पानी व मिट्टी आवश्यक है तो बेहतर आबोहवा यानी अच्छा पर्यावरण भी।

    सजगता है आवश्यक

    उत्तराखंड में जंगलों की सेहत सुधारने में प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना, यानी कैंपा की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। किसी भी योजना, परियोजना को हस्तांतरित होने वाली वन भूमि में खड़े जितने पेड़ों की बलि दी जाती है, उसके सापेक्ष 10 गुना अधिक पौधारोपण दूसरे क्षेत्र में किया जाता है। यह इसलिए कि आक्सीजन का भंडार कहे जाने वाले यहां जंगलों के क्षेत्र में कमी न आए। कैंपा के अंतर्गत ये कार्य निरंतर हो रहे हैं, लेकिन इन्हें लेकर वह सजगता नजर नहीं आती, जिसकी आवश्यकता है। अब लैंसडौन और कालागढ़ वन प्रभागों में कैंपा से हुए कार्यों को ही ले लीजिए। इन्हें लेकर अंगुलियां उठ रही हैं और स्वयं विभाग के भीतर से भी ये बातें बाहर आ रही हैं। शासन ने इसका संज्ञान लिया है, लेकिन प्रश्न ये भी है कि कार्य शुरू होते से पहले ऐसी सजगता, सतर्कता क्यों नहीं होती।

    वन्यजीवों पर साया

    कोरोना संक्रमण के मामले पूरे प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में जनमानस के साथ ही वन्यजीवों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। विशेषकर चिडिय़ाघरों, रेसक्यू सेंटरों में रहने वाले वन्यजीवों को लेकर। खतरा ये है कि यदि वहां कोई कार्मिक कोरोना संक्रमित हुआ और उसमें कोई लक्षण नहीं दिख रहे तो उससे वन्यजीवों तक भी कोरोना का संक्रमण फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही आरक्षित व संरक्षित वन क्षेत्रों में भी इसी तरह की चिंता बनी हुई है। यद्यपि, वन विभाग ने सभी जगह कोरोना से निबटने के मद्देनजर हरसंभव उपाय किए हैं। सभी कार्मिकों को कोरोनारोधी वैक्सीन की डबल डोज लग चुकी है। चिडिय़ाघरों में सुरक्षित शारीरिक दूरी के मानकों का पालन करते हुए वन्यजीवों का रखरखाव किया जा रहा है। इसी तरह की व्यवस्था जंगलों के लिए भी की गई है, लेकिन चिंता है कि कम होने का नाम नहीं ले रही।

    जैवविविधता विरासतीय स्थल

    उत्तराखंड जैवविविधता के मामले में बेहद धनी है। यहां नाना प्रकार की जड़ी-बूटियों का विपुल भंडार इसका उदाहरण है। जैवविविधता के संरक्षण के लिए राज्य में जैवविविधता अधिनियम लागू है और इसके अंतर्गत जैवविविधता विरासतीय स्थल अधिसूचित करने का प्रविधान है। इसमें ऐसे क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है, जो अपनी विशिष्ट जैवविविधता की पहचान रखते हैं। इस कड़ी में प्रदेशभर में 13 स्थलों का अध्ययन कराया गया। इसके बाद प्रथम चरण में पिथौरागढ़ में थलकेदार और टिहरी जिले में देवलसारी को जैवविविधता विरासतीय स्थल बनाने की कसरत हुई, लेकिन यह ठंडे बस्ते से बाहर नहीं निकल पाई है। यह सही है कि विरासतीय स्थल बनने पर कुछ पाबंदियां भी लागू होती हैं, लेकिन यहां तो स्थानीय निवासियों के आगे आने के बाद भी कवायद नहीं हो रही। देवलसारी के निवासियों ने तो इस संबंध में स्वयं प्रस्ताव दिया है, लेकिन उनकी साध अभी तक पूरी नहीं हो पाई है।

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