हिमालयी ग्लेशियरों की सेहत का सच: सैटेलाइट डेटा क्यों दे रहा गलत संकेत
एक नए शोध से पता चला है कि हिमालयी ग्लेशियरों की सेहत का आकलन करने में सैटेलाइट तस्वीरें अक्सर गलत जानकारी देती हैं, खासकर मानसून प्रभावित क्षेत्रों में।

सांकेतिक तस्वीर।

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सुमन सेमवाल, देहरादून। हिमालय के ग्लेशियरों की सेहत को समझने के लिए दुनियाभर के विज्ञानी वर्षों से सैटेलाइट तस्वीरों का सहारा लेते रहे हैं।
माना जाता रहा है कि गर्मियों के अंत में ग्लेशियर पर जहां तक बर्फ बची रहती है, वही उसकी वास्तविक 'संतुलन रेखा' यानी एक्विलिब्रिम लाइन एल्टीट्यूड (ईएलए) के करीब होती है। लेकिन अब एक नए अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अध्ययन में पाया गया कि मानसून प्रभावित हिमालयी क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित अनुमान कई बार वास्तविक स्थिति से काफी अलग निकलते हैं।
यह अध्ययन नेपाल के दूध कोशी बेसिन और विशेष रूप से मेरा ग्लेशियर क्षेत्र पर किया गया। इस क्षेत्र में माउंट एवरेस्ट के आसपास के कई प्रमुख ग्लेशियर हैं। शोध को चंद रोज पहले जर्नल आफ ग्लेशियोलाजी में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन दल में आइआइटी इंदौर, फ्रांस और नेपाल के विज्ञानी शामिल रहे। विज्ञानियों के अनुसार किसी भी ग्लेशियर पर दो प्रक्रियाएं लगातार चलती रहती हैं।
एक ऊपर की ओर नई बर्फ जमा होना और दूसरी नीचे की ओर बर्फ का पिघलना। जिस ऊंचाई पर जमा होने वाली बर्फ और पिघलने वाली बर्फ लगभग बराबर हो जाती है, उसे ईएलए कहा जाता है। यही ग्लेशियर की 'स्वास्थ्य रेखा' मानी जाती है।
अगर ईएलए लगातार ऊपर जा रही है तो इसका मतलब है कि ग्लेशियर तेजी से कमजोर हो रहा है। अब तक विज्ञानी सैटेलाइट तस्वीरों में दिखने वाली 'स्नोलाइन एल्टीट्यूड' यानी बर्फ की अंतिम सीमा को ईएलए का प्रतिनिधि मानते थे। लेकिन यह शोध बताता है कि मानसूनी हिमालय में यह तरीका सटीक नहीं है।
इस तरह मिले गलत आंकड़े
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 से 2023 तक सेंटिनल-2 और लैंडसेट-8 सैटेलाइट की हजारों तस्वीरों का अध्ययन किया। लगभग 6330 स्नोलाइन माप तैयार किए गए और उन्हें प्लेनेट और वीनस सैटेलाइट से भी जांचा गया।
तकनीकी रूप से सैटेलाइट डेटा काफी सटीक पाया गया, लेकिन जब इसकी तुलना जमीन पर वैज्ञानियों की ओर से लिए गए वास्तविक मापों से की गई तो बड़ा अंतर सामने आया।
सैटेलाइट तस्वीरों में जो अंतिम बर्फ रेखा दिख रही थी, वह वास्तविक ईएलए से लगातार नीचे मिल रही थी। यानी तस्वीरों से ऐसा लग रहा था कि ग्लेशियर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है, जबकि जमीन पर वास्तविक स्थिति अधिक चिंताजनक थी।
इसलिए आंकड़े आए गलत
वैज्ञानियों ने इसके पीछे कई प्राकृतिक कारण बताए। जैसे मानसून के दौरान नई बर्फबारी और मध्य हिमालय में जून से सितंबर के बीच भारी मानसून का आना। इसी समय ग्लेशियर सबसे ज्यादा पिघलते भी हैं। लेकिन मानसून के दौरान ऊंचाई वाले इलाकों में नई बर्फ भी गिरती रहती है।
इससे सैटेलाइट तस्वीरों में कई बार ऐसा लगता है कि ग्लेशियर पर ज्यादा बर्फ बची हुई है। मानसून के दौरान लगातार बादल रहने से साफ तस्वीरें मिलना मुश्किल हो जाता है। कई बार सैटेलाइट बर्फ और बादलों में अंतर ठीक से नहीं कर पाता। इससे स्नोलाइन गलत दर्ज हो सकती है।
वहीं, ऊंचे हिमालयी इलाकों में तेज हवाएं एक जगह की बर्फ को दूसरी जगह पहुंचा देती हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में कृत्रिम रूप से ज्यादा बर्फ दिखाई देती है जबकि कुछ हिस्से खाली दिखते हैं। विज्ञानियों ने कहा कि हिमालय का भूभाग बेहद जटिल है।
ऊंची चोटियों की छाया, गहरी दरारें और ढलानों की दिशा सैटेलाइट सेंसर को भ्रमित कर सकती हैं। कई बार छाया वाले हिस्सों में बर्फ सही तरीके से दिखाई नहीं देती।
कई बार बहुत ऊंचाई पर कई बार बर्फ बिना पिघले सीधे भाप में बदल जाती है, जिसे सबलिमेशन कहते हैं। इससे वास्तविक बर्फ हानि अधिक होती है, लेकिन सैटेलाइट इसे सही तरह से पकड़ नहीं पाता।
हिमालय एशिया का वाटर टावर, एक गड़बड़ी भी भारी पड़ सकती है
विज्ञानियों के मुताबिक हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहा जाता है। यहां के ग्लेशियर गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों को पानी देते हैं। करोड़ों लोगों की खेती, पेयजल और जलविद्युत परियोजनाएं इन पर निर्भर हैं।
यदि ग्लेशियरों के स्वास्थ्य का अनुमान गलत निकला तो भविष्य के जल संकट का आकलन प्रभावित हो सकता है। साथ ही बाढ़ और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट जैसी आपदाओं की भविष्यवाणी कमजोर पड़ सकती है।
जलवायु परिवर्तन के माडल गलत दिशा में जा सकते हैं और नदी प्रवाह और जलविद्युत योजनाओं की गणना प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि हिमालय जैसे मानसून प्रभावित क्षेत्रों के लिए यूरोप या अन्य ठंडे देशों वाले पुराने माडल सीधे लागू नहीं किए जा सकते।
शोधकर्ताओं ने यह दी सलाह
अध्ययन में कहा गया है कि केवल आप्टिकल सैटेलाइट तस्वीरों पर निर्भर रहने के बजाय फील्ड माप बढ़ाने होंगे और अधिक उच्च-रिजोल्यूशन सैटेलाइट इस्तेमाल करने होंगे।
मौसम, हवा और बर्फबारी के स्थानीय पैटर्न को माडल में शामिल करना होगा। हिमालय के लिए अलग क्षेत्रीय पद्धति विकसित करनी होगी, तभी ग्लेशियरों की वास्तविक स्थिति का सही आकलन हो सकेगा।
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