उत्तराखंड कांग्रेस के पितामह हरीश रावत का छह दशक लंबा राजनीतिक सफर और वर्तमान चुनौतियाँ
उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने ब्लॉक प्रमुख से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का लंबा राजनीतिक सफर तय किया है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून। बढ़ती उम्र, बदलती कांग्रेस, नई पीढ़ी के नेताओं का उभार और बदली राजनीतिक परिस्थितियां। 78 वर्षीय कांग्रेस नेता हरीश रावत के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन छह दशक से ज्यादा लंबे राजनीतिक सफर ने उन्हें वह अनुभव दिया है, जो उत्तराखंड कांग्रेस के बहुत कम नेताओं के पास है।
इसलिए, उन्हें केवल पूर्व मुख्यमंत्री कहना उनके राजनीतिक सफर को छोटा करने जैसा होगा। वह उस पीढ़ी के नेता हैं, जिन्होंने उत्तराखंड को अलग राज्य बनते देखा, नए राज्य की पहली राजनीतिक करवट देखी, कांग्रेस की सत्ता देखी, भाजपा का उभार देखा, अपनी सरकार का संकट देखा और पार्टी के साथ ही अपनी करारी हार भी देखी।
मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता से घिरा रहा और कांग्रेस ने सबसे बड़ी टूट भी देखी। यद्यपि, पिछले पांच साल से हरदा पार्श्व में हैं, लेकिन एक दौर वह भी था, जब कहा जाता था कि हरदा जो कहें वही सही।
27 अप्रैल 1948 को अल्मोड़ा जिले के मोहनारी गांव में जन्मे हरीश रावत ने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने जमीनी स्तर से राजनीति की शुरुआत की और युवा कांग्रेस से जुड़े।
1971 में वह भिकियासैंण के ब्लाक प्रमुख बने। साथ ही पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपनी जगह मजबूत की। शुरुआती दौर में चुनावी राजनीति में उन्हें झटके भी मिले, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता लगातार बनी रही।
हरदा ने 1980 में अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में पर्दापण किया। इसके बाद 1984 और 1989 में भी वह लोकसभा पहुंचे।
2002 में वह राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और 2009 में लोकसभा के लिए। 2009 से 2014 के बीच उन्होंने श्रम एवं सेवायोजन, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण और संसदीय कार्य राज्य मंत्री और फिर जल संसाधन मंत्री के रूप में दायित्व का निर्वहन किया।
वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में रावत की संगठनात्मक भूमिका महत्वपूर्ण रही। तब वह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे।
हालांकि, वह मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने पंडित नारायण दत्त तिवारी को यह जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद रावत राज्यसभा पहुंचे।
2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी वह दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया।
हालांकि इसके बाद प्रदेश की राजनीति में तेजी से बदलाव आया। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद 2014 में कांग्रेस सरकार में हुए नेतृत्व परिवर्तन में विजय बहुगुणा की जगह हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया।
2016 में कांग्रेस में हुई बड़ी टूट
मुख्यमंत्री बनने के बाद रावत सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता की रही। मार्च 2016 में कांग्रेस के नौ विधायकों के बगावत कर भाजपा का दामन थामने से उनकी सरकार संकट में आ गई। केंद्र ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया।
इसके बाद मामला न्यायिक लड़ाई तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रावत सरकार की बहाली हुई और उन्होंने विधानसभा में बहुमत साबित किया।
2017 से मिल रहे लगातार झटके
राज्य में 2017 का विधानसभा चुनाव रावत के राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े झटकों में शामिल रहा। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों पर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भी करारी हार मिली और भाजपा सत्ता में आ गई। चुनावी हार के बाद भी रावत कांग्रेस की प्रदेश राजनीति में सक्रिय रहे।
उन्होंने पार्टी के भीतर अपनी भूमिका बनाए रखी और लगातार राज्य के राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय नजर आए। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने हरदा को नैनीताल-ऊधम सिंह नगर सीट से मैदान में उतारा, लेकिन इसे भी वह हार गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी रावत समेत कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
जमीनी राजनीति और अलग अंदाज ने बनाई पहचान
हरदा की राजनीति के केंद्र में पहाड़ और उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दे हमेशा प्रमुख रहे हैं। वह स्थानीय खान-पान, लोक संस्कृति और क्षेत्रीय मुद्दों को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाने के लिए भी जाने जाते हैं।
लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में संगठनात्मक पकड़ के चलते कांग्रेस में उन्हें वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है।
अब वह उनके ओएसडी के खिलाफ ईडी की कार्रवाई के बाद इस्तीफे की पेशकश करने के कारण चर्चा में हैं। उनकी यह पेशकश ऐसे समय में आई है, जब कांग्रेस विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है।
यह भी पढ़ें- पूर्व सीएम हरीश रावत का जांच एजेंसियों को खुला चैलेंज, बोले- जितनी जांच करनी है कर लो
