रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। शिक्षा विभाग में अब खटपट कम सुनाई पड़ेगी। गाहे-बगाहे इसका असर सरकार पर दिखता रहा है। घर में बर्तन ठीक से एडजस्ट हों तो आवाज नहीं सुनाई पड़ती। अन्यथा दरवाजा कितना ही बंद रखें, आवाज बाहर आ ही जाती है। शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय की सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम से पटरी नहीं बैठी। पिछली दो पुरानी सरकारों में भी कई मर्तबा बात ऊपर तक पहुंची थी। ऊपर वालों ने जब तक नहीं चाहा, सचिव नहीं बदले गए। खटपट के साथ चहलकदमी चलती रही। अब बदलाव की नई बयार के साथ पहली दफा मंत्रियों को सुखद अहसास हो रहा है। विभागीय अफसरों को भी फेंटा जा चुका है। यह बात अलग है कि सरकार के पास अब ज्यादा समय नहीं बचा। विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने में छह-सात महीने बचे हैं। फिलहाल मंत्रीजी खुश हैं। पूरे जोशोखरोश के साथ और ना-नुकुर किए बगैर नई टीम फैसले ले रही है।

निजाम बदलते ही फेंट दिए अफसर

कहते हैं कभी न कभी ऊंट पहाड़ के नीचे आ ही जाता है। शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने आखिरकार इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। शासन की नाक के नीचे देहरादून जैसा महत्वपूर्ण जिला। मंत्रीजी अपनी पसंद के अधिकारी को इस सीट पर बैठाना चाह रहे थे। उन्होंने कोशिश की, मुराद पूरी होने में पेच फंस गया। जिले में मुख्य शिक्षा अधिकारी पद मंत्रीजी की पसंद को तरजीह दिए बगैर आशारानी पैन्यूली को सौंप दिया गया। बीच में मंत्रीजी ने उनका तबादला कर आनंद भारद्वाज को तैनात किया। उन्होंने एकतरफा कार्यभार संभाला, लेकिन पैन्यूली ने उन्हें कार्यभार नहीं सौंपा। बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के वीटो की वजह से पैन्यूली पद पर बरकरार रहीं। मंत्रीजी को खूब अखरा, लेकिन मन मसोस के रह जाना पड़ा। यह मुराद अब पूरी हुई है। निजाम बदला तो मंत्रीजी ने भी पैन्यूली समेत आधा दर्जन से ज्यादा अफसरों को जमीन दिखा दी।

मुखिया बिन सूने पड़े सरकारी स्कूल

सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शिक्षा विभाग की एक गुत्थी सुलझने का नाम ही नहीं ले रही है। राज्य में सरकारी इंटर कालेजों में प्रधानाचार्यों के 1069 पद खाली है। महज 317 कालेजों के पास ही मुखिया हैं। बगैर मुखिया के चल रहे इन कालेजों की दशा और दिशा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। दरअसल प्रदेश में सरकारी हाईस्कूलों के प्रधानाध्यापक के 912 पद स्वीकृत हैं। इनमें भी 275 पद भरे गए हैं। 637 पद खाली हैं। प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक के पद पदोन्नति के हैं। प्रधानाचार्य पदों को भरने में सबसे बड़ा पेच प्रधानाध्यापकों के कम पद हैं। ये पद पूरे भर जाने की स्थिति में भी प्रधानाचार्य पद खाली रहने तय हैं। इसकी वजह प्रधानाध्यापकों के कम पद हैं। प्रधानाध्यापकों के पदों को भरने में भी तत्परता नहीं दिखाई जाती। शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंतित सरकार इस समस्या की तोड़ अभी नहीं ढूंढ पाई।

महकमे के वजन से हुए हलकान

उच्च शिक्षा जैसा भारी-भरकम विभाग अब प्रभारी सचिव के हवाले है। विभाग और प्रभारी सचिव दोनों का ही ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है। बड़े साहब जो विभाग को संभाले हुए थे, अब मुख्यमंत्री की टीम का हिस्सा हैं। प्रदेश में युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नौकरशाही में बड़ा उलट-पुलट कर दिया। वर्षों से एक ही जगह पर जमे हाकिमों की जमीन डोल चुकी है। इस सबके बीच जो विभाग सबसे ज्यादा अचरज में है, वह उच्च शिक्षा ही है। राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति राज्यपाल हैं। विश्वविद्यालयों के मुखिया यानी कुलपतियों का रैंक तकरीबन प्रमुख सचिव के बराबर आंका जाता है। उच्च शिक्षा में जो स्नातक डिग्री कालेज के प्राचार्य हैं, उनका वेतनमान सचिव के बराबर है। स्नातकोत्तर कालेजों के प्राचार्यों की बात ही छोड़ दीजिए। कुलाधिपति की सीधी निगाह में होने और वेतनमान के लिहाज से वजनदार महकमे की कमान प्रभारी सचिव के पास। अंदाजा लगाया जा सकता है।

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Edited By: Sunil Negi