छिपे रास्तों और कहानियों की खोज.. दून के युवाओं ने बना दी ट्रेकिंग कम्युनिटी
देहरादून के युवाओं ने प्रकृति और शहर के छिपे रास्तों को जानने के लिए 'दून वाकर्स' नामक एक ट्रेकिंग कम्युनिटी ...और पढ़ें
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छिपे रास्तो और कहानियों की खोज में मसूरी के सुकून भरे रास्ते पर ट्रेकिंग के लिए निकले युवा

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वत्सल गुप्ता, जागरण देहरादून। प्रकृति की खूबसूरत वादियों में बसे देहरादून का सूकून कभी अलग ही था, लेकिन आज शहर के शोर के बीच ये सूकून भी गुम होता जा रहा है। पेड़ कटते जा रहे हैं, शहर का विकास हो रहा हैै और युवा अपने उस दून को भुलते जा रहे हैं, जो वो कभी हुआ करता था।
शहर के आसपास फैले जंगल, पहाड़, पुराने गांव और सदियों पुरानी पगडंडियां दून की असली पहचान का हिस्सा हैं। इन्हीं रास्तों और उनसे जुड़ी कहानियों को तलाशने का जुनून दून के युवाओं को एक साथ ले आया है।

प्रकृति को करीब से जानने के विचार ने युवाओं की एक ट्रेकिंग कम्युनिटी को जन्म दिया है। एक युवा के शुरू हुए सफर में आज हजारों युवा जुड़ चुके हैं। दून और आसपास के इलाकों में खूबसूरत पहाड़ों, जंगलों और पुराने रास्तों को सिर्फ तस्वीरों में देखने के बजाय पैदल चलकर महसूस करने के विचार से इस कम्युनिटी की शुरुआत हुई।
देहरादून निवासी अविरल जैन ने 30 मार्च 2025 को इसी सोच के साथ इंटरनेट मीडिया पर दून वाकर्स की शुरुआत की। धीरे-धीरे प्रकृति और ट्रेकिंग में रुचि रखने वाले युवा इससे जुड़ते चले गए। युवाओं ने दून के खूबसूरत और ऐसी जगहों को तलाशना शुरू किया, जो जंगल के मार्ग और सूकून से भरे हो।
हर दूसरे रविवार एक नई जगह चुनने का सिलसिला शुरू हो गया। हर बार नया रास्ता और नई कहानी के साथ सैकड़ों युवा पीठ पर बैग लेकर उस समय पैदल सड़कों से दूर निकल पड़ते हैं, जब शहर पूरी तरह जागता भी नहीं है। खास बात यह है कि इस पहल में अलग-अलग क्षेत्रों और उम्र के युवा शामिल हैं।
इंटरनेट मीडिया पर होने वाली बातचीत के बाद पैदल यात्रा का स्थान और दिन तय किया जाता है। इसके बाद छुट्टी के दिन सभी एक जगह ट्रेकिंग के लिए जुटते हैं। कम्युनिटी से जुड़े युवाओं का कहना है कि ट्रेकिंग उनके लिए केवल पहाड़ चढ़ना या घूमना नहीं है।
यह प्रकृति के साथ समय बिताने, शहर की भागदौड़ से दूर होने और अपने आसपास के उन हिस्सों को जानने का माध्यम है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनका कहना है कि ट्रेकिंग में मंजिल से ज्यादा अहमियत रास्ते की होती है। पेड़ों की छांव, पहाड़ की ढलान, चिड़ियों की आवाज और दूर दिखाई देता कोई छोटा-सा गांव.. हर पड़ाव दून की प्रकृति की एक नई कहानी सुनाता है।
40 एपिसोड पूरे... हर दूसरे रविवार निकलते हैं ट्रेकिंग पर
दून वाकर्स के संस्थापक अविरल जैन ने बताया कि हर दूसरे रविवार को एक नई जगह तलाशने के लिए युवाओंं को अपने साथ लेकर निकल पड़ते हैं। अब तक 40 एपिसोड पूरे कर अलग-अलग जगहों पर ट्रेकिंग कर अपने शहर को पैदल समझने का प्रयास कर चुके हैं।
उन्होंने कहा कि ट्रेकिंग के दौरान हर रास्ते की अपनी कहानी होती है। कहीं शहर से बाहर निकलता रास्ता, कहीं नहर के किनारे की पगडंडी, कहीं देहरादून से आगे जाती सड़क। इन रास्तों पर चलते हुए महसूस होता है कि शहर सिर्फ बिल्डिंग, ट्रैफिक और सड़कों का नाम नहीं है। शहर उन रास्तों का भी नाम है जिन्हें लोग याद रखते हैं।
जुड़े हजारों युवा, ग्रुप पर तय होती है नई लोकेशन
दून के छिपे रास्तों और कहानियों की खोज में शुरू हुई इस यात्रा में अब हजारों युवा जुड़े चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के जरिए इस कम्युनिटी में अब तक सात हजार से ज्यादा लोग जुड़े है।
हर दूसरे रविवार निकलने से पहले ग्रुप पर ही नई लोकेशन तय की जाती है। अविरल जैन ने बताया कि 1966 में उनके परदादा भी देहरादून से पैदल निकलकर इसी तरह यात्रा करते थे।
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