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दिन में 'मेट्रो सिटी'.. नाइट में पुलिस की 'जागीर', देहरादून में रात होते ही बदल जाएगा आपका प्रोफाइल

Published: Sun, 13 Sep 2026 09:44 AM (IST)Updated: Sun, 13 Sep 2026 09:57 AM (IST)

देहरादून में रात 11 बजे के बाद युवाओं को संदिग्ध मानकर पुलिस की रोक-टोक और पूछताछ से नागरिक असहज महसूस ...और पढ़ें

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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अंकुर अग्रवाल, देहरादून। दून मेट्रो सिटी बनने की तैयारी में है, मगर पुलिस की सोच अब भी उस शहर से बाहर नहीं निकल पाई है जहां रात का मतलब सिर्फ सन्नाटा और घरों के बंद दरवाजे हुआ करता था। शहर बदल गया, उसकी रात बदल गई, लेकिन पुलिस की कार्यशैली नहीं बदली।

रात 11 बजते ही सड़कों पर निकलने वाले युवाओं को रोकना, पूछताछ करना और चेकिंग के नाम पर उन्हें असहज करना अब सामान्य होता जा रहा है। शुक्रवार रात निरंजनपुर मंडी के पास जन्मदिन मना रहे युवाओं को लाठियां भांजकर दौड़ाने की घटना इसी सोच का ताजा उदाहरण है।

पुलिस को चेकिंग का अधिकार है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। मगर अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं कि सड़क पर दिखने वाला हर युवा पुलिस के लिए संदिग्ध हो जाए। अपराध रोकने की जिम्मेदारी और नागरिकों को अपराधी की तरह ट्रीट करने के बीच फर्क समझना पुलिसिंग की पहली शर्त है।

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क्या नाइट शो देखकर घर लौटना संदिग्ध गतिविधि?

देहरादून में फिलहाल यही फर्क गायब होता दिख रहा है। सवाल उठ रहा कि क्या देहरादून की पुलिस के लिए रात में बाहर होने की कोई वैध वजह हो सकती है। क्या दोस्त का जन्मदिन मनाना अपराध है। क्या नाइट शो देखकर घर लौटना संदिग्ध गतिविधि है और क्या रात की शिफ्ट करने वाला कर्मचारी पुलिस की पूछताछ से बचने के लिए दिन में काम करने लगे। अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है तो पुलिस को अपनी चेकिंग की भाषा और तरीका दोनों बदलने होंगे।

रात होते ही बदल जाता है नागरिक का दर्जा

दिन में यही युवा शहर की अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। कोई दफ्तर में काम करता है, कोई कारोबार करता है, कोई कालेज जाता है, कोई रात की शिफ्ट करता है। लेकिन रात 11 बजे के बाद वही युवा सड़क पर दिखाई दे जाए तो पुलिस की निगाह बदल जाती है। पूछताछ ऐसे, जैसे कोई अपराध कर दिया हो असैा व्यवहार ऐसा, जैसे सड़क पर निकलना पुलिस से अनुमति लेकर हो।

कानून की हिफाजत जरूरी, मगर ऐसे नहीं

समाजसेवी अनूप नौटियाल के अनुसार कानून तोड़ने वालों पर सख्ती होनी चाहिए। शराब पीकर वाहन चलाने वाले, रेस लगाने वाले, स्टंट करने वाले, हुड़दंग करने वाले और दूसरों की सुरक्षा खतरे में डालने वालों पर पुलिस का डंडा पड़ना ही चाहिए। मगर सिर्फ इसलिए किसी को डांटना, धमकाना या लाठी लेकर दौड़ाना कि वह रात में सड़क पर मौजूद है तो यह कानून-व्यवस्था नहीं, पुलिसिंग की असफल समझ का संकेत है।

नाइट शो ढाई बजे तक, 11 बजे से पुलिस का ‘नाइट कर्फ्यू’

देहरादून में मल्टीप्लेक्स के नाइट शो रात ढाई-पौने तीन बजे तक खत्म होते हैं। होटल-रेस्टोरेंट, अस्पताल, परिवहन, मीडिया और तमाम सेवाओं में रातभर काम चलता है। लोग रेलवे स्टेशन व आइएसबीटी पहुंचते हैं, यात्राएं करते हैं, अपने परिचितों को लेने निकलते हैं। शहर की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली 24 घंटे की तरफ बढ़ रही है। लेकिन पुलिस की घड़ी में रात 11 बजे के बाद जैसे शहर का सामान्य नागरिक ‘संदिग्ध’ हो जाता है।

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पुलिस को यह समझना होगा कि सुरक्षा का मतलब नागरिकों को डराकर घर भेजना नहीं है। पुलिस की मौजूदगी से अपराधी डरें और आम आदमी खुद को सुरक्षित महसूस करे, अच्छी पुलिसिंग यही है। इसके उलट यदि पुलिस को देखकर सामान्य युवा सड़क छोड़ने लगे, पूछताछ के डर से देर रात निकलने से कतराए और हर चेकिंग प्वाइंट पर खुद को कठघरे में खड़ा महसूस करे तो यह सुरक्षा व्यवस्था की सफलता नहीं, उसकी विफलता है। -डा. स्वाति मिश्रा, काउंसलर एवं मनोचिकित्सक