दैनिक जागरण अभियान, ये फुटपाथ हमारा है: दून की माडल रोड पर पैदल चलने वालों का हक बेदखल
देहरादून की माडल रोड पर करोड़ों खर्च के बावजूद फुटपाथों पर अतिक्रमण का बोलबाला है। पैदल यात्रियों को सड़क पर ...और पढ़ें

निरंजनपुर मंडी के बाहर फुटपाथ पर फल विक्रेता का पूरी तरह कब्जा। जागरण
HighLights
माडल रोड के फुटपाथों पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा
पैदल यात्रियों को जान जोखिम में डाल सड़क पर चलना पड़ रहा
करोड़ों खर्च के बाद भी फुटपाथों की हालत खराब
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। राजधानी की जिस माडल रोड को पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित व व्यवस्थित बनाने का दावा किया गया था, आज उसी सड़क पर सबसे ज्यादा बेदखल पैदल चलने वाले हैं।
आइएसबीटी से घंटाघर तक साढ़े छह किलोमीटर लंबे मार्ग पर फुटपाथ नाम की व्यवस्था तो है, लेकिन उस पर अधिकार राहगीरों का नहीं, बल्कि अतिक्रमणकारियों का है।
कहीं कारों का बाजार सजा है, कहीं गैराज खुले हैं, कहीं दुकानें सड़क तक फैली हैं तो कहीं सरकारी होर्डिंग ही रास्ता रोककर खड़े हैं।

यह स्थिति तब है, जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि फुटपाथ पर पहला और अंतिम अधिकार पैदल चलने वालों का है।
फुटपाथ को किसी भी कीमत पर पार्किंग, कारोबार या अतिक्रमण का अड्डा नहीं बनने दिया जा सकता। लेकिन दून की तथाकथित माडल रोड पर न्यायालय की यह भावना पूरी तरह दम तोड़ती दिखाई दे रही है।
बता दें कि वर्ष 2017 में तत्कालीन शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने आइएसबीटी से घंटाघर तक माडल रोड विकसित करने का सपना दिखाया था।
जेसीबी चली, कब्जे टूटे, करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन नौ साल बाद हालत यह हैं कि पैदल चलने वालों को फुटपाथ छोड़कर वाहनों के बीच से गुजरना पड़ रहा है।
शिमला बाईपास से लालपुल, माजरा, पटेलनगर, गांधी रोड और घंटाघर तक फुटपाथों पर 500 से अधिक छोटे-बड़े कब्जे हो चुके हैं। कई जगह तो फुटपाथ दिखाई तक नहीं देते।

फुटपाथ नहीं, बन गए कार बाजार
माजरा से भूसा स्टोर तक करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र में फुटपाथ कार बाजार में बदल चुके हैं। ब्रिडकुल कार्यालय के पास, होटल सुंदर पैलेस के सामने, पटेलनगर और मातावाला बाग तक वाहन फुटपाथ और सड़क दोनों पर खड़े रहते हैं। नतीजा यह कि पैदल चलने वालों को जान जोखिम में डालकर सड़क पर उतरना पड़ता है।
112 गैराज और वर्कशाप ने छीन लिया पैदल यात्रियों का रास्ता
माडल रोड पर 112 गैराज और वर्कशाप फुटपाथ को अपनी कार्यशाला की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बाइक और कारों की मरम्मत सड़क और फुटपाथ पर हो रही है। माजरा, इनामुल्ला बिल्डिंग और गांधी रोड क्षेत्र में फुटपाथ पर चलना लगभग असंभव हो चुका है।

सरकारी होर्डिंग भी बने अतिक्रमणकारी
विडंबना यह है कि फुटपाथ बचाने की जिम्मेदारी निभाने वाला नगर निगम खुद 10 बड़े होर्डिंग फुटपाथ पर खड़े कर चुका है। यानी जिस रास्ते को लोगों के लिए बनाया गया था, वहां सरकार ही बाधा बन गई।
इसके साथ ही साढ़े छह किलोमीटर लंबे मार्ग पर 30 बिजली के पोल, छह ट्रांसफार्मर और तीन हैंडपंप आज भी फुटपाथ के बीचोंबीच खड़े हैं। निर्माण के समय इन्हें हटाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन विभागों के बीच तालमेल के अभाव में यह काम कभी पूरा नहीं हुआ।

आठ करोड़ खर्च, पैदल यात्री फिर भी बेसहारा
करीब नौ करोड़ रुपये खर्च कर नालियां, फुटपाथ और रेलिंग बनाई गईं, लेकिन अधिकांश स्थानों पर काम अधूरा छोड़ दिया गया। लालपुल से प्रिंस चौक तक कई जगह फुटपाथ टूट चुके हैं और 22 स्थानों पर नालियां खुली पड़ी हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पैदल यात्रियों को कोई राहत नहीं मिली।
जेसीबी चली, लेकिन अतिक्रमण फिर लौट आया
जून 2017 में दर्शनलाल चौक, निरंजनपुर, माजरा और इनामुल्ला बिल्डिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाया गया था। लेकिन प्रशासन की ढिलाई के चलते कब्जाधारियों ने फिर फुटपाथों पर कब्जा जमा लिया। अब हालत यह हैं कि माडल रोड पर पैदल चलने वाले सबसे कमजोर और सबसे उपेक्षित वर्ग बनकर रह गए हैं।
सवालों के घेरे में जिम्मेदार
- जब सुप्रीम कोर्ट फुटपाथों को पैदल यात्रियों का संवैधानिक अधिकार मान चुका है, तो दून में यह अधिकार किसके हवाले कर दिया गया?
- करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पैदल यात्री सड़क पर क्यों उतरने को मजबूर हैं?
- क्या माडल रोड सिर्फ फाइलों में ही माडल बनकर रह गई?
- सबसे बड़ा सवाल, आखिर राजधानी में फुटपाथों का मालिक कौन है-राहगीर या अतिक्रमणकारी?
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