देहरादून, केदार दत्त। 19 साल का अरसा किसी मसले को सुलझाने के लिए कम नहीं होता, मगर यहां तो इस लिहाज से सन्नाटे का ही आलम रहा। मसला जुड़ा है चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुके मानव-वन्यजीव संघर्ष से। राज्य गठन से लेकर अब तक 840 लोगों की वन्यजीवों के हमले में हुई मौत स्थिति की भयावहता को बयां करने के लिए काफी है। अब जबकि पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है तो मानव और वन्यजीवों से छिड़ी जंग को थामने की दिशा में कार्ययोजना तैयार की जा रही है।

वन्यजीव प्रभावित गांवों में विलेज वॉलेंटरी फोर्स गठित की जा रही हैं तो हर प्रभाग स्तर पर रैपिड रिस्पांस टीमों के गठन की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। सह अस्तित्व की भावना के मद्देनजर महाराष्ट्र मॉडल को पूरे राज्य में अपनाने की तैयारी है। सूरतेहाल उम्मीद जगी है कि नए साल में इस संघर्ष को थामने की मुहिम परवान चढ़ेगी। ऐसे उपाय सामने आएंगे, जिससे मनुष्य भी महफूज रहे और वन्यजीव भी। 

यह किसी से छिपा नहीं है कि 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में फूल-फल रहा वन्यजीवों का कुनबा उसे देश-दुनिया में विशिष्टता प्रदान करता है। बावजूद इसके तस्वीर का दूसरा पहलू भी है और वह है वन्यजीवों के लगातार बढ़ते हमले। 13 जिलों वाले इस राज्य का शायद ही कोई गांव, शहर ऐसा होगा, जहां जंगली जानवरों ने दिन का चैन और रातों की नींद न उड़ाई हो। हालांकि, ये भी सही है कि इस जंग में मनुष्य के साथ ही वन्यजीवों को भी कीमत चुकानी पड़ रही है। 

ऐसा नहीं है कि यह दिक्कत अभी-अभी उत्पन्न हुई हो। राज्य गठन के वक्त ही उत्तराखंड को यह समस्या विरासत में मिली है। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि तब से इसके समाधान को प्रभावी उपाय क्यों नहीं किए गए। क्यों मनुष्य और बेजुबानों की मौत के आंकड़े को बढऩे दिया जा रहा है। ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्न हर किसी के जहन में कौंध रहे हैं। जवाब तलाशें तो यही पता चलता है कि सिस्टम ने कभी भी इसे गंभीरता से नहीं लिया।

ये बात अलग है कि सरकार, शासन और वन महकमे ने इसे लेकर दावे तो किए, मगर धरातल पर ठोस पहल नहीं हुई। यदि होती तो वन्यजीवों के हमलों को थामा जा सकता था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद, 19 साल के इंतजार के बाद मानव-वन्यजीव संघर्ष को थामने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार की गई है। कुछ जगह इसे धरातल पर आकार भी दिया जाने लगा है। नए साल में यह मुहिम तेजी से परवान चढ़ेगी। 

ये उपाय चढ़ेंगे परवान 

हर प्रभाग का एक्शन प्लान

मानव और वन्यजीवों के बीच छिड़ी जंग को थामने के लिए प्रभाग स्तर पर एक्शन प्लान तैयार हो रहा है। इसके तहत संघर्ष वाले क्षेत्र चिह्नित कर वहां इसकी रोकथाम को ठोस कदम उठाए जाएंगे। 

वॉलेंटरी विलेज प्रोटेक्शन फोर्स

गुलदार, बाघ, हाथी समेत दूसरे वन्यजीवों से प्रभावित क्षेत्रों के गांवों में वॉलेंटरी विलेज प्रोटेक्शन फोर्स गठित की जाएंगी। राज्य वन्यजीव बोर्ड इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुका है। यह फोर्स गांव के स्वयंसेवियों की होगी, जो वन कर्मचारियों के आने से पहले स्थिति संभालने, ऑपरेशन में मदद और जनजागरूकता की दिशा में कार्य करेगी। 

रैपिड रिस्पांस टीम

सभी संरक्षित और आरक्षित क्षेत्रों में वनकर्मियों की रैपिड रिस्पांस टीमों के गठन का क्रम शुरू किया गया है। अभी तक राजाजी रिजर्व के अलावा पांच वन प्रभागों की इनका प्रशिक्षण हो चुका है। नए साल में सभी वन प्रभागों, टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य व सेंचुरी में इन टीमों के गठन की कवायद शुरू होगी। 

उत्तराखंड में महाराष्ट्र मॉडल 

गुलदार समेत दूसरे वन्यजीवों के खौफ को देखते हुए महाराष्ट्र मॉडल को राज्य में उतारने की तैयारी है। इसके तहत महाराष्ट्र के मुंबई में संजय गांधी नेशनल पार्क और चुनार क्षेत्र में हुई गुलदार के संग रहने की पहल को यहां उतारा जा रहा है। 

जंगल में रोकेंगे वन्यजीवों को

इस कड़ी में वन्यजीव प्रभावित इलाकों में वन सीमा पर वन्यजीव रोधी सोलर पावर बाड़, मजबूत दीवार, बंद पड़े गलियारों को खुलवाने की कवायद समेत अन्य कदम भी उठाए जाएंगे। 

वन्यजीवों के हमले  (2001 से 2019 तक) 

-402 लोगों की गुलदारों ने ली जान 

-168 मारे गए हाथी के हमलों में 

-46 लोगों को बाघों ने मारा 

-54 लोग भालू के हमलों में मरे 

-114 की सर्पदंश से गई जान 

-27 लोगों की जान अन्य वन्यजीवों ने ली 

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वन्यजीवों की मौत 

-416 हाथियों की मौत 19 साल में 

-137 बाघों की मृत्यु 

-1179 गुलदारों की गई जान 

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गुलदारों ने उड़ाए रखी नींद 

वन्यजीवों के हमलों में गुलदार ने सबसे अधिक नींद उड़ाई हुई है। गुजरे साल भी पहाड़ से मैदान तक गुलदारों का खौफ तारी रहा। विभागीय आंकड़े देखें तो गुलदारों ने सर्वाधिक 20 लोगों की जान ली। इसके अलावा हाथियों ने आठ, बाघ ने तीन, भालू ने दो और अन्य वन्यजीवों के हमलों में दो लोग मारे गए। सर्पदंश से 12 लोगों की मौत हुई। 

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Posted By: Raksha Panthari

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