कौशल किशोर। Chamoli Disaster एक बार फिर उत्तराखंड के पहाड़ों में तबाही मची। आपदा प्रबंधन में लगे जवान बचाव अभियान में कूद पड़े। श्रमिकों को तपोवन के सुरंग से सुरक्षित बाहर निकालने का काम जारी है। इस हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों और घायल लोगों के लिए केंद्र और राज्य की सरकारों ने राहत पैकेज का भी एलान किया है। यह नरमदिली इतने तक ही सीमित नहीं है। निजी क्षेत्र के उदार लोग ऐसे मौकों पर चूकते नहीं हैं। इन सबके बावजूद भी क्षतिपूर्ति मुमकिन नहीं है। सुरक्षित जीवन से जुड़ा यह कार्य आसान नहीं है। इसके बाद पुनर्निर्माण की बारी आती है। कल इसकी भी तैयारी शुरू होगी। दरअसल विकास के सपनों की अपनी अहमियत है।

हिमालय में जल प्रलय की स्थिति अब अक्सर होने लगी है। बरसात का मौसम होना इसके लिए अनिवार्य शर्त भी नहीं रह गया। पिछले साल पूर्वी हिमालय में गर्मी आरंभ होते ही बाढ़ की समस्या शुरू हुई। बौछारों के साथ बाढ़ की लहरों का सिलसिला बरसात के खत्म होने तक चलता रहा। असम के कई जिले इसकी जद में थे। उत्तराखंड की तबाही के बाद हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले लाहुल स्पीति में करीब 56 पनबिजली परियोजनाओं के विरुद्ध चल रहा जनांदोलन तेज हो गया है। ग्राम पंचायतों ने इस सिलसिले में अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं जारी करने का प्रस्ताव पारित किया है। पश्चिमी छोर की अपेक्षा पूर्वी हिमालय में सक्रिय पर्यावरण संरक्षण समूह बेहतर रूप से संगठित हैं। सूबे की सरकारें प्रकृति के प्रेमियों को चीनी एजेंट बता कर देश का नुकसान ही करती हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से सीख लेने की जरूरत है। आज जनजातीय इलाकों में सुलगते अंगारों को यह हादसा दहकते शोलों में तब्दील करने में सक्षम है। इस मुश्किल से बचना चाहिए।

नदियों व बांधों में जमी गाद की समस्या : ऋषिगंगा बैराज को नष्ट करने वाले हिमशिखर के स्खलन के कारण एक बार फिर गाद की समस्या चर्चा में है। हालांकि अन्य बांधों का प्रवाह रोक कर डाउनस्ट्रीम में बाढ़ को नियंत्रित अवश्य किया गया। साथ ही, यह भी सच है कि यदि जल प्रवाह के मार्ग में बांध नहीं होते तो इस कदर नुकसान नहीं होता। दरअसल नदी को बांधने से अपस्ट्रीम में गाद जमना शुरू होता है। इसकी वजह राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक सूत्र है, नदी में पानी तो बहे पर शिला और गाद नहीं।

गंगा एक्शन प्लान शुरू करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भागीरथी पर टिहरी बांध के निर्माण को आगे बढ़ा कर आधुनिक विकास में प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया था। विशेषज्ञों का आकलन है कि इसका विशाल जलाशय अगले 100 वर्षो में गाद से भर जाएगा। परंतु आज गाद के जमा होने की रफ्तार पूर्व के इसके अनुमानों से कहीं तेज है। टिहरी बांध के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले स्थानीय जानकारों का दावा है कि इसे भरने में कुल 35 साल लगेंगे।

गाद की समस्या हिमालय तक ही सीमित नहीं है। बारिश के दिनों में उत्तर बिहार के बड़े इलाके में लगभग हर बार बाढ़ आती है। पिछले साल भी बिहार बाढ़ में डूब रहा था। इस कारण सरकारी खजाने पर सैकड़ों करोड़ का बोझ हर वर्ष बढ़ता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि इसकी वजह बंगाल के फरक्का डैम के कारण जमा होने वाली गाद है। पिछले पांच वर्षो से उनकी सरकार इसे हटाने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने संबंधित विशेषज्ञ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल और राजेंद्र सिंह के साथ मिलकर इस पर काम शुरू किया था। इस क्रम में अविरलता बिन गंगा निर्मल नहीं जैसा नारा भी गढ़ा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल कर पूरे देश के लिए डिसिल्टिंग पॉलिसी की जरूरत पर चर्चा की गई थी।

पारंपरिक संस्कृति की समझ : सिंधु, गंगा और ब्रrापुत्र जैसी हिमालय से निकलने वाली नदियों के मैदानी क्षेत्र में पहुंचने पर लोग बाढ़ की स्थिति का सामना करते रहे। गांव का समाज इसे अपने हित में मानकर इसके स्वागत की तैयारियां करता था। कृषि संस्कृति की समझ होने पर यह बखूबी समझ में आती है। हिमालय से निकलने वाली नदियों की घाटी में ही नहीं, बल्कि अफ्रीका की नील नदी के बाढ़ वाले इलाके में बसने वालों को भी बाढ़ के साथ बहने वाले गाद में छिपे उपयोगी तत्वों की अहमियत का ज्ञान था। कृषि की इस संजीवनी को खत्म किए बगैर रासायनिक खाद और कीटनाशकों के व्यापार की सफलता भी दूर की कौड़ी साबित होती।

शब्द विचार के विमर्श में स्पष्ट होता है कि बाढ़ और बढ़िया एक ही कुल के संज्ञा और विशेषण हैं। ये सीधे तौर पर पानी और गाद से संबंधित हैं। इसके विपरीत एक अन्य विशेषण है, घटिया। यह घाट से बना है। नदियों के किनारे पनपने वाली संस्कृतियों में बढ़िया और घटिया की समझ विद्यमान रही। जब नदी पास आती है तो आप बढ़िया कहलाते हैं और जब नदी के घाट पर ठहरते हैं तो घटिया साबित होते हैं। नदी पर समंदर का पहला हक मान कर हमारे पूर्वजों ने छोटे-छोटे घाटों का निर्माण कराया। इसके पीछे देवी और माता मानी गई नदियों की अर्चना का उद्देश्य था।

आधुनिक सभ्यता का विकासवाद और उपभोक्तावाद एक अर्से से वैश्वीकरण और उदारीकरण का लबादा ओढ़ कर देशवासियों को खूब पाठ पढ़ा रहा है। नतीजतन व्यापक स्तर पर विकास की मांग हुई। जनमानस इसके ही सपनों में खोया है। हालांकि इसके विरुद्ध भी दम तोड़ने के लिए रह रह कर संक्षिप्त स्वर उभरता है। कई दशक पूर्व टिहरी बांध के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले वयोवृद्ध गांधीवादी सुंदर लाल बहुगुणा आज विकास के इस उपहार से फिर आहत हैं। गंगा की निर्मलता हेतु आमरण अनशन करते प्राण त्यागने वाले गंगापुत्र निगमानंद और प्रायश्चित के दौरान दुनिया से विदा होने वाले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जैसे तपस्वी को लोगों ने महान आत्मा मान कर स्वयं को पृथक कर लिया था। इस महान सभ्यता के शंखनाद के सामने आत्मसमर्पण करना ही इस युग की पहचान है। इस महानता के पैरोकार खूब बोलते हैं कि नदी में साफ पानी बहे, परंतु गाद नहीं।

इसी क्रम में बीते दिनों राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण देश में गंगाजल पीने वाले श्रद्धालुओं की सेहत को लेकर चिंतित हुआ। इसके अध्यक्ष आदर्श कुमार गोयल ने प्रशासन को उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए कहा है। गंगा प्रदूषण का निवारण करने के लिए सरकार ने विकास की नई योजनाओं के दस्तावेज पेश किए हैं। आजकल अलकनंदा की आवाजें दूरदराज तक गूंज रही हैं। जनजातीय समाज भी इसी पर विचारमग्न है। ध्यान केंद्रित करने की उचित बात यही है।

[पर्यावरण मामलों के जानकार]

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Edited By: Sanjay Pokhriyal