राज्य ब्यूरो, देहरादून

उत्तराखंड में सदियों से बोली और लिखी जा रही गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाओं के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की आस जगी है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं नैनीताल से सांसद अजय भट्ट ने शुक्रवार को लोकसभा में इस सिलसिले में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। भट्ट ने बताया कि इसके अलावा उन्होंने समान नागरिक संहिता व जनसंख्या नियंत्रण विधेयक भी रखे और इन्हें भी स्वीकार कर लिया गया।

सासद भट्ट ने गढ़वाली-कुमाऊंनी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने संबंधी विधेयक पेश करते हुए कहा कि उत्तराखंड के लाखों लोगों द्वारा बोली व लिखी जाने वाली इन भाषाओं को अभी तक राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। वह भी तब जबकि मध्य हिमालय के इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ये भाषाएं बोली जा रही हैं। उन्होंने कहा कि 13वीं शताब्दी से पहले जब हिदी भाषा का अस्तित्व नहीं था, तब भी सहारनपुर से हिमाचल तक फैले गढ़वाल राज्य का राजकाज गढ़वाली भाषा में किया जाता था।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देवप्रयाग मंदिर में महाराजा जगतपाल के वर्ष 1335 के दानपात्र पर उत्कीर्ण लेख, देवलगढ़ में अजयपाल का 15 वीं शताब्दी का लेख, बदरीनाथ एवं मालूद्यूल समेत अन्य स्थानों पर मिले ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण लेख गढ़वाली भाषा के प्राचीनतम होने के प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि प्रचार-प्रसार के साथ ही पर्याप्त सुविधाएं न मिलने से आज यह दोनों भाषाएं अपना अस्तित्व व गरिमा बनाए रखने को संघर्ष कर रही हैं। मध्य हिमालयी क्षेत्र की जनता और भाषा प्रेमियों की भावना को ध्यान में रखते हुए गढ़वाली व कुमाऊंनी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर इन्हें राष्ट्रीय भाषाओं की तरह दर्जा और सम्मान दिया जाना चाहिए। इन भाषाओं के प्रचार-प्रसार को अन्य भाषाओं की तर्ज पर एक अकादमी की स्थापना की जानी चाहिए।

सासद भट्ट ने दूसरा विधेयक पेश करते हुए कहा कि देश में एक समान नागरिक कानून बनाने केलिए अनुच्छेद 44 के तहत राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के रूप में शामिल किया गया है। समान नागरिक कानून बनाने की पैरवी करते हुए उन्होंने सदन में विधेयक प्रस्तुत किया। भट्ट ने जनसंख्या नियंत्रण विधेयक भी रखा और कहा कि देश की जनसंख्या अनियंत्रित होती जा रही है। इस समस्या के निदान को जनसंख्या नियंत्रण विधेयक बनाने की नितांत जरूरत है।

Posted By: Jagran

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