बांटने वाली इस राजनीति से बाज आइए!
अखिलेश यादव द्वारा उत्तराखंड मूल के निवासियों को 'घुसपैठिया' कहने पर राजनीतिक घमासान मच गया है। लेख इस टिप्पणी को ...और पढ़ें

मनोज कुमार झा, राज्य संपादक दैनिक जागरण उत्तराखंड।
HighLights
अखिलेश यादव ने उत्तराखंडियों को 'घुसपैठिया' कहा, विवाद बढ़ा।
भाजपा ने सपा-कांग्रेस पर साधा निशाना, कांग्रेस चुप।
अंतरराज्यीय विस्थापन पर टिप्पणी, राष्ट्रीय एकता का मुद्दा।
ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता में भाजपा की लगातार तीसरी बार वापसी की प्रबल संभावनाओं ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की घबराहट बढ़ा दी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कई बार घबराहट में इंसान ऊलजुलूल और असंगत बातें करने लगता है।
उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड मूल के निवासियों को घुसपैठिया कहना अखिलेश की इसी घबराहट और सियासी चिंता से उपजी टिप्पणी प्रतीत होती है। अभी 26 साल पहले तक दोनों प्रदेश एक थे। कहीं कोई विलगाव या दूरियां थी ही नहीं।
दूरस्थ पहाड़ी जिलों के तमाम विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ जैसे विश्वविद्यालयों तक जाते थे। इनमें से कइयों को नौकरी-चाकरी या जीवन-यापन का जरिया उधर मैदानी क्षेत्रों में ही मिल जाता। फिर लोग वहीं घर बना लेते और स्थायी रूप से बस भी जाते थे।

राजधानी दिल्ली को छोड़ भी दें तो आज लखनऊ समेत यूपी के प्रायः बड़े शहरों में उत्तराखंड मूल के अनगिनत बाशिंदे वहां के स्थायी निवासी बन गए हैं। लखनऊ की वर्तमान मेयर सुषमा खर्कवाल और कानपुर की गोविंदनगर सीट के वर्तमान विधायक सुरेंद्र मैथानी उत्तराखंड मूल के ही हैं।
ऐसे और भी अनगिनत नाम हो सकते हैं। अखिलेश की नजरों में तो मानो यह सब कुछ अनर्थ जैसा हो गया है कि “घुसपैठिये” मेयर और विधायक तक बन बैठे हैं। खुद अखिलेश और उनके भाई की पत्नियां भी उत्तराखंड मूल की ही हैं।
ऐसे में यदि अखिलेश के नजरिये से देखें तो यह चिंताजनक है कि खुद उनके ही घर में “घुसपैठये” कई सालों से दाखिल हुए पड़े हैं। वास्तविकता तो यह है कि अलग प्रदेश बनने के बावजूद दोनों तरफ के लोगों के मन में परस्पर घुसपैठ या अतिक्रमण जैसी कोई भावना रही ही नहीं।
उत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी और ऊधम सिंह नगर जैसे जिलों में यूपी के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर आदि सीमावर्ती जिले के बाशिंदे कब आए, कब प्लाट या दुकानें खरीदीं और कब यहां के स्थायी निवासी बन गए, इनका कोई लेखा-जोखा ही नहीं है।
और फिर यह बात सिर्फ यूपी और उत्तराखंड के संदर्भ की नहीं, बल्कि लगभग पूरी हिंदी पट्टी के लिए है। उत्तर भारत के ज्यादातर बड़े शहरों में सामाजिक और मिश्रित संस्कृति इसलिए फल-फूल रही है, क्योंकि यहां की आबादी में विभिन्न बोलियों, भाषा-भाषी, क्षेत्र और प्रांत के लोग बिना किसी भेदभाव या विलगाव के एक समरस जीवन-यापन कर रहे हैं।
यह बहुआयामी स्वरूप इन शहरों की खूबसूरती भी है। इतना ही नहीं, संविधान निर्माताओं ने भारत के राष्ट्र राज्य होने की जो संकल्पना की थी, उसे ये नगर, ये शहर और ये प्रांत जीवंत भी कर रहे हैं।
देश के किसी गांव, कस्बे या शहर की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर सिर्फ वहां के लोगों का नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष का सीना चौड़ा होता है। अल्मोड़ा या बलिया के किसी रणबांकुरे के सर्वोच्च बलिदान पर सिर्फ उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि पूरे देश की आंखें पुरनम होती हैं।
यही भारत की आत्मा का मूल स्वर है और राष्ट्र राज्य की संकल्पना का आधार भी। आश्यर्यजनक तो यह है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के हमदर्दों को उत्तराखंडवासी आज यूपी में घुसपैठिये नजर आ रहे हैं।
अभी हाल ही में समाजवादी पार्टी समेत पूरे विपक्ष ने एनआरसी और सीएए का गला फाड़कर सिर्फ इसलिए विरोध किया था, क्योंकि इससे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत से बाहर निकालने का दरवाजा खुलने वाला था।
वर्तमान में एसआइआर के विरोध के पीछे भी एक कारण तो यह है ही कि इससे इन घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से बाहर हो रहे हैं। इन घुसपैठियों ने देश के कई हिस्सों की जनसांख्यिकी का चेहरा बिगाड़ दिया है।
अखिलेश को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यदि वह कामकाज या जीवन-यापन के सिलसिले में देश में अंतरराज्यीय विस्थापन के खिलाफ हैं तो फिर देश की सुरक्षा के लिए लगातार खतरा बनते जा रहे पड़ोसी देशों से आए घुसपैठियों के हमदर्द कैसे बने हुए हैं।
अखिलेश को यदि ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में स्थायी रूप से निवास कर रहे उत्तराखंडवासी उनके वोटर नहीं हैं तो फिर उन्हें इसके कारणों की ओर झांकना चाहिए। उन्हीं की पार्टी की सरकार ने पृथक राज्य आंदोलन का जिस निर्ममता से दमन किया था, इसे कोई भी उत्तराखंडी भूला नहीं है।
अखिलेश को इस पुराने जख्म को कुरेदने की नहीं, बल्कि उस पर मरहम लगाने की जरूरत है। वर्तमान में उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर सपा की कोई खास अहमियत भले न हो, लेकिन अखिलेश की इस तरह की बचकाना बयानबाजी का नुकसान उनकी सहयोगी कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। भाजपा ने अखिलेश के साथ-साथ कांग्रेस पर भी बराबर का निशाना साधना शुरू कर दिया है। प्रदेश संगठन के कुछ नेताओं को छोड़ दें तो कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने अभी तक इस पर चुप्पी साध रखी है।
यह चुप्पी उत्तराखंड में आत्मघाती साबित हो सकती है। कांग्रेस की त्रासदी यह है कि उसके खुद के नेतागण आए दिन ऊलजुलूलस टिप्पणियों से बाज नहीं आ रहे हैं। ताजा उदाहरण उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का है।
कांग्रेस प्रधानमंत्री के लिए कब्र खोदने का भी नारा लगा चुकी है। सपा हो या कांग्रेस या फिर कोई अन्य दल, सभी को नफरत और विद्वेष की इस गलीज सियासत से बाज आने की जरूरत है।
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