क्या है उत्तराखंड का पिरूल मॉडल? बनाया जाता है खास ईंधन... कार्बन उत्सर्जन भी बेहद कम
उत्तराखंड के चंपावत का पिरूल ब्रिकेट मॉडल पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण आजीविका का प्रतीक बन गया है।


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संवाद सहयोगी, चंपावत । पहाड़ की प्रकृति के अनुरूप विकास का सजीव उदाहरण चंपावत में देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना के तहत चंपावत को मॉडल जिला बनाने की दिशा में उठाया गया कदम अब पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण आजीविका के संतुलन का प्रतीक बन गया है।
लधियाघाटी के भिगराड़ा गांव में स्थापित पिरूल ब्रिकेट यूनिट ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर भी विकास की मजबूत नींव रखी जा सकती है।
10 क्विंटल ब्रिकेट का उत्पादन
उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) को नोडल एजेंसी बनाकर भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) के सहयोग से शुरू की गई यह बायोमास आधारित परियोजना चीड़ की सूखी पत्तियों यानी पिरूल को उपयोगी ईंधन में बदल रही है। इससे एक ओर जंगलों में आग का खतरा कम हुआ है, तो दूसरी ओर स्वच्छ ऊर्जा का नया विकल्प सामने आया है।
प्रतिदिन लगभग 10 क्विंटल ब्रिकेट उत्पादन करने वाली इस यूनिट से 15 किलोमीटर के दायरे में वनाग्नि की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। अब शासन ने पिरूल संग्रह के मूल्य में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ग्रामीणों, खासकर महिलाओं की आय में भी वृद्धि हुई है।
ग्राम प्रधान गीता भट्ट के नेतृत्व में भिगराड़ा गांव की करीब 80 महिलाएं इस परियोजना से जुड़कर प्रकृति संरक्षण के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। इसी सामूहिक प्रयास और पर्यावरणीय योगदान के चलते परियोजना को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली द्वारा प्रतिष्ठित स्काच अवार्ड से सम्मानित किया गया है। आईआईपी के विज्ञानी डा पंकज आर्य के अनुसार निकट भविष्य में रुद्रप्रयाग, पौड़ी, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों में भी पिरूल ब्रिकेट यूनिटें स्थापित की जाएंगी।
15 किलोवाट के पावर कनेक्शन पर संचालित हो रही यूनिट
आईआईपी के विज्ञानी पंकज आर्य ने बताया कि करीब 15 लाख रुपये की लागत से स्थापित यह यूनिट 15 किलोवाट के पावर कनेक्शन पर संचालित हो रही है। बताया कि उत्तराखंड में उपलब्ध पिरूल की अपार मात्रा राज्य की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करने में सक्षम है। यदि ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ सीमित मात्रा में पिरूल ब्रिकेट का उपयोग किया जाए, तो कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
स्थानीय स्तर पर हरित ईंधन का प्रयोग शुरू
विज्ञानी पंकज आर्या ने बताया कि स्थानीय स्तर पर पिरूल ब्रिकेट से पैदा होने वाले हरित ईंधन को अपनाने की शुरुआत हो चुकी है। गुरुद्वारा श्री रीठा साहिब में इसका सफल प्रयोग किया गया है। आने वाले समय में आवासीय विद्यालयों, मिड-डे मील रसोई, डे-केयर सेंटर और अन्य संस्थानों में भी इसके उपयोग की संभावनाएं हैं। इससे न केवल ईंधन की स्वच्छ उपलब्धता सुनिश्चित होगी, बल्कि गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग और धुएं से भी राहत मिलेगी।
चंपावत में स्थापित होंगी दो और इकाईयां
भिगराडा़ यूनिट की सफलता को देखते हुए चंपावत जिले में दो और पिरूल ब्रिकेट इकाईयां स्थापित करने के लिए सर्वेक्षण कार्य किया जा रहा है। जिलाधिकारी मनीष कुमार का कहना है कि चंपावत के चीड़ बहुल क्षेत्रों में इस तरह की और इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं। महिलाओं के रोजगार और कौशल विकास से जुड़ी एपीडी विम्मी जोशी ने इसे ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बताया है।
जंगल से पिरूल लाकर उसका बजन लिया जाता है। जिसके बाद उसे चापर से काटकर मशीन में डाला जाता है। डाइड्रोलिक प्रेशर के जरिए पिरूल ठोस रूप लेकर अलग-अगल टुकड़ों में गिरता है और बिक्रेट तैयार हो जाते हैं। पिरूल में कुछ भी नहीं मिलाया जाता। - गीता भट्ट, ग्राम प्रधान
प्रकृति के अनुरूप विकास, स्वच्छ ऊर्जा और रोजगार का यह समन्वित मॉडल चंपावत को न केवल राज्य बल्कि पूरे देश में एक नई पहचान दिला रहा है। भिंगराड़ा में संचालित पिरूल ब्रिकेट की सफलता ने उत्तराखंड के अन्य चीड़ बाहुल्य पर्वतीय जिलों में भी इस प्रकार की यूनिटे स्थापित करने के द्वार खोल दिए हैं। - पंकज आर्य, विज्ञानी, आईआईपी
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