दीपक सिंह धामी, टनकपुर

होली का पर्व आपसी सौहा‌र्द्ध और शांति का प्रतीक है। क्षेत्र में रंगों का त्योहार होली बढे़ हर्षोल्लास से मनाया जाता है, लेकिन टनकपुर शहर से सटे ग्राम नायकगोठ में वर्ष 1972 में होली के दिन एक ऐसी खूनी होली हुई। जिसमें ग्रामीणों के बीच खूनी संघर्ष हो गया व एक ग्रामीण की जान चली गई। जिसके बाद ग्रामीण दो गुटों में बंट गए। जिसने तब से अब तक रंगों के इस त्योहार को बेरंग कर दिया। जिसके कटु अनुभव को देखते हुए ग्रामीण 48 सालों से होली नहीं मना रहे है। यद्यपि महिलाओं ने बैठकी होली गायन फिर से शुरू कर दिया है, लेकिन पुरुष वर्ग अब भी होली गायन से परहेज करता है। पूर्व में कुछ ग्रामीणों ने वर्ष 1988 में होली गायन पुन: शुरू करने का प्रयास किया। लेकिन दुस्वप्न जैसे उस खूनी होली के खौफ की वजह से उनका प्रयास परवान नहीं चढ़ा। जिसके चलते उन्होंने होली न मनाने का ही निर्णय ले लिया। आज भी कुछ युवा इसे शुरू करने का प्रयास करते है, लेकिन पुराने लोग किसी अनहोनी की आशका के चलते उनका साथ देने से कतराते है।

======== क्या कहते हैं ग्रामीण

ग्रामीण नारायण सिंह ने बताया कि 70 के दशक में नायकगोठ की होली गांव सहित क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध थी। विभिन्न गांवों के अलावा शहर से भी लोग होली गायन में भाग लेने वहां पहुंचते थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 1972 में बड़े उल्लास के साथ गांव में बढ़ी होली का आयोजन किया गया था, लेकिन मामूली सी बात में दो ग्रामीणों के बीच हुई कहा सुनी ने ऐसा रूप लिया कि शांती व भाइचारे के साथ खेली जाने वाली होली खूनी संघर्ष में बदल गई। यह घटना दुखद जरूर थी, लेकिन इससे भी ज्यादा कटु अनुभव यह रहे कि गांव भी दो हिस्सों में बट गया। यहां तक की जिस पक्ष का आदमी मर गया था उन्होंने दूसरे पक्ष के साथ हुक्का पानी तक बंद कर दिया। ======== ग्रामीण कृष्ण सिंह का कहना है गांव के सभी अखिलतारणीय खिलपती लोहाघाट के है और जैसे सामूहिकता पर्वतीय क्षेत्र की पहचान होती है। वैसी ही सामूहिक रूप से सभी त्योहारों और पर्वो का आयोजन एक साथ होता था। यहां तक की गर्मियों में पूरा कर पूरा गांव पहाड़ को व जाड़ों में टनकपुर नायकगोठ में आ जाता था। उनका कहना है होली का इतना उत्साह लोगों में रहता था कि कई माह पूर्व से ग्रामीण तैयारियां शुरू कर देते थे। यहां तक की ढोलक भी विजय सार की लकड़ी से गांव में ही बनाई जाती थी। :::========== पूर्व प्रधान नारायण सिंह का कहना है कि पूर्व में शिवरात्रि के दिन से बैठकी और एकादशी के दिन से खड़ी होली गांव में धूमधाम से मनाई जाती थी। अन्य कार्य भी गांव के सभी लोग सामूहिक रूप से करते थे, लेकिन उस घटना के बाद से लोगों में जहां खटास पैदा हो गई। वही लंबे समय तक आपसी वैमनस्य की भावना भी दोनों पक्षों में रही। उन्होंने बताया कि उस समय ढोलक के उस्ताद गिरधर सिंह, गौरी सिंह, गोकरन सिंह और गायन में दीवान सिंह, लक्ष्मण सिंह धामी, रत्‍‌न सिंह, भगवान सिंह आदि थे।

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