उत्तराखंड में आजादी का जश्न मनाकर लौट रहे बच्चों को जान का जोखिम, नदी पार जाना था; बहने से बचा बच्चा
चंपावत में बूंगादुर्गापीपल तोक के बच्चे ककनई इंटर कॉलेज जाने के लिए हर दिन 4 किमी पैदल चलकर उफनती नदी पार करते हैं, जिससे उनकी जान को खतरा रहता है।
HighLights
बूंगादुर्गापीपल तोक के बच्चे 4 किमी पैदल चलकर स्कूल जाते हैं
बरसात में उफनती नदी पार करना बच्चों के लिए जानलेवा होता है
स्थानीय लोग नदी पर पुल बनाने की स्थायी मांग कर रहे हैं
जागरण संवाददाता, चंपावत। आजादी के 80 साल बाद भी पहाड़ के बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच आसान नहीं हो सकी है। बूंगादुर्गापीपल तोक से ककनई इंटर कालेज जाने वाले बच्चे रोज करीब चार किलोमीटर पैदल सफर करते हैं।
बरसात में रास्ते की नदी उफान पर आ जाती है तो यही बच्चे जान जोखिम में डालकर उसे पार करने को मजबूर हैं। यह स्थिति व्यवस्था के विकास के दावों पर सवाल खड़ा करने के साथ ही यह पूछ रहा है कि आखिर बच्चों के स्कूल तक पहुंचने के रास्ते में पुल कब आएगा।
बच्चों की राह में बरसात आते ही उफनती नदी
स्कूल जाने की उम्र में बच्चों के हाथों में किताब-कापियां होनी चाहिए, लेकिन बूंगादुर्गापीपल तोक के बच्चों की राह में बरसात आते ही उफनती नदी खड़ी हो जाती है। ककनई इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों को रोज करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय पहुंचना पड़ता है। इस सफर में नदी पड़ती है और बारिश के दिनों में उसका बहाव बच्चों के लिए खतरा बन जाता है। शनिवार को विद्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौटते हुए बच्चे नदी के तेज बहाव के बीच से गुजरते नजर आए।
पानी का बहाव तेज होने के बावजूद बच्चे एक-दूसरे का सहारा लेकर नदी पार कर रहे हैं। यह दृश्य किसी दुर्गम पर्यटन स्थल का रोमांच नहीं, बल्कि उन बच्चों की मजबूरी है, जिनके लिए स्कूल पहुंचना रोजमर्रा की जरूरत है। इसी दौरान के बच्चे का हाथ छूटने पर वह बहने से भी बचा।
सामान्य दिनों में बच्चे चार किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर लेते हैं, लेकिन बारिश शुरू होते ही स्थिति बदल जाती है। नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ रास्ता जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे में अभिभावकों की चिंता भी बढ़ जाती है। बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसलिए उन्हें स्कूल भेजना मजबूरी है और सुरक्षित लौटने की चिंता अलग।
एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों को सड़क और बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़ने की योजनाओं की बात होती है, वहीं दूसरी ओर बच्चे आज भी नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं। यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की प्राथमिकता पर सवाल है। स्थानीय लोगों की मांग है कि जिम्मेदार विभाग मौके का स्थलीय निरीक्षण कर समस्या का स्थायी समाधान करें।
नदी पर पुल या सुरक्षित पैदल मार्ग बनाया जाए, ताकि बरसात में बच्चों को जान जोखिम में डालकर स्कूल न जाना पड़े। जब तक स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक बारिश के मौसम में बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था की जानी चाहिए। वहीं घटना के बाद इंटरनेट मीडिया पर वीडियो प्रसारित होने के बाद चर्चा का विषय बना हुआ है।
बच्चों की राह में कितनी मुश्किलें
- बूंगादुर्गापीपल टोक से ककनई इंटर कॉलेज तक करीब चार किमी पैदल सफर।
- रास्ते में पड़ती है नदी, बारिश में बढ़ जाता है जलस्तर।
- उफान के दौरान बच्चे जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर।
- सामने आए वीडियो में तेज बहाव के बीच नदी पार करते दिखे बच्चे।
- अभिभावकों को हर बरसात में बच्चों की सुरक्षा की चिंता।
सवाल जो व्यवस्था से जवाब मांगते हैं
- स्कूल तक सुरक्षित रास्ता कब?
बच्चों को विद्यालय तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़ रही है, तो सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था क्यों नहीं?
- बरसात में वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं?
नदी का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
- पुल का इंतजार कब तक?
स्थायी समाधान के लिए नदी पर पुल या सुरक्षित पैदल मार्ग की जरूरत है।
आजादी के 80 साल... फिर भी नदी के भरोसे शिक्षा
देश आजादी के 80वें वर्ष में पहुंच गया। विकास की नई इबारत लिखने और दूरस्थ गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन बूंगादुर्गापीपल टोक के बच्चों की तस्वीर इन दावों के बीच एक तीखा सवाल बनकर सामने है—जब बच्चे स्कूल तक सुरक्षित नहीं पहुंच पा रहे तो विकास की मंजिल आखिर किसके लिए है?
