बागेश्वर में उभरा पहाड़ के बुजुर्गों के अकेलेपन का सच, विनोद कापड़ी की फिल्म ने बयां की पलायन की कसक
उत्तराखंड के गांवों में युवाओं के पलायन के कारण बुजुर्गों के बढ़ते अकेलेपन को विनोद कापड़ी की फिल्म 'पायर' ने ...और पढ़ें
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HighLights
विनोद कापड़ी की फिल्म 'पायर' ने बुजुर्गों का अकेलापन दिखाया।
युवाओं के पलायन से गांवों में बुजुर्ग अकेले रह गए।
आर्थिक संपन्नता के बावजूद भावनात्मक सहारे की है जरूरत।
जागरण संवाददाता, बागेश्वर। रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों से हो रहे पलायन के बीच पीछे छूटते बुजुर्गों का अकेलापन अब सिनेमा के जरिए समाज के सामने आ रहा है। फिल्म पायर इसी संवेदनशील मुद्दे को उठाती है। गुरुवार को फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी यहां पहुंचे। फिल्म के मुख्य नायक, पूर्व सैनिक पदम सिंह और नायिका हीरा देवी भी इस दौरान उपस्थित रहे।
फिल्म की कहानी जीवन के उस पड़ाव की पीड़ा बयां करती है, जब बुजुर्ग अपनों के लौटने की राह देखते रहते हैं। उनके पास अनुभवों और यादों का खजाना होता है, लेकिन उन्हें सुनने और समय देने वाला कोई नहीं होता। पेंशन, आर्थिक संपन्नता और घर में जरूरी सुविधाएं होने के बावजूद अपनों की कमी उनके जीवन में खालीपन पैदा करती है। पहाड़ के गांवों में यह समस्या गहरी होती जा रही है।
रोजगार और नौकरी के लिए युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। पीछे रह जाते हैं सूने घर और अपनों की प्रतीक्षा करते बुजुर्ग। उम्र के साथ उनकी जरूरतें भी बदलती हैं। दवा, भोजन और आर्थिक मदद के अलावा उन्हें भावनात्मक सहारे, बातचीत और देखभाल की जरूरत होती है। घर में सभी सुविधाएं होने पर भी अपनों की अनुपस्थिति उनका अकेलापन बढ़ा सकती है।
‘पायर’ यानी चिता की कहानी हर परिवार से जुड़ा सवाल उठाती है। कामकाज और जिम्मेदारियों के बीच हम अक्सर बुजुर्गों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, जबकि उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और बच्चों का भविष्य संवारने में बिताया होता है।
उनके पास कुछ देर बैठना, हाल पूछना और बातें सुनना भी उनके लिए बड़ी खुशी बन सकता है। फिल्म का संदेश है कि बुजुर्गों को आर्थिक मदद और सुविधाओं के साथ अपनेपन और साथ की भी जरूरत है। परिवार का स्नेह और अकेले न होने का भरोसा उनके लिए बड़ा संबल बन सकता है।
