बागेश्वर, [जेएनएन]: कत्यूर व चंद शासकों के समय नागर शैली में यहां कई एतिहासिक तीर्थ स्थलों का निर्माण हुआ। इतिहास की यह अनमोल धरोहर रखरखाव के अभाव में धीरे-धीरे खत्म होते जा रही हैं। अगर समय रहते इन विरासतों को नहीं सहेजा गया तो यह कहीं इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएंगी।

बागेश्वर जिले में बैजनाथ और बागनाथ दो प्रसिद्ध एतिहासिक तीर्थस्थल हैं। यहां के एतिहासिक मंदिर रखरखाव के अभाव में  जीर्ण-क्षीर्ण होते जा रहे हैं। बैजनाथ मंदिर तो लगातार झुकते जा रहा है। यह मंदिर 18 डिग्री तक झुक गया है। अगर यह ऐसे ही झुकता रहा तो एक दिन यह खूबसूरत हस्तशिल्प का मंदिर धराशायी हो जाएगा। लेकिन इस ओर कोई कार्रवाई नही हो रही है। 

ऐसा ही हाल बागनाथ मंदिर का भी है। मंदिर के आसपास लगातार निर्माण कार्य हो रहा है। जिससे इसकी खूबसूरती फीकी पड़ती जा रही है। एतिहासिक मंदिर को सहेजने व संरक्षण के लिए कोई कार्रवाई नही की जा रही है। जहां एक ओर चार धाम के तीर्थस्थलों को संरक्षित करने के लिए सरकार नीतियां बना रही है, वहीं कुमांऊ क्षेत्र की एतिहासिक धरोहरे जीर्ण-क्षीर्ण होते जा रही हैं। इसके संरक्षण के लिए फिलहाल कोई कार्य होते नही दिखाई दे रहा है।

एक रात में बनाया गया बैजनाथ मंदिर 

बैजनाथ मंदिर परिसर जिले के गरुड़ तहसील में गोमती नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर परिसर एक हजार साल प्राचीन है और नागर शैली में बना हुआ है। यह मंदिर विशाल पाषण शिलाओं से बनाया गया है। बताते हैं कि यह मंदिर सिर्फ एक रात में ही बनाया गया था। यहां की  मूर्तियों को देखकर अभी भी यह लगता है कि ये अभी बोल पड़ेंगी। यहां पर माता पार्वती की आदम कद मूर्ति है। 

उसी के आगे शिवलिंग की स्थापना की गई है। बैजनाथ में गोमती और गरुड़ गंगा बहती हैं। संगम के किनारे ही सन् 1150 का बना हुआ मंदिर समूह है जिसे कत्यूरी राजाओं ने बनवाया था। यहां पत्थर से निर्मित कई मंदिर हैं जिनमें मुख्य मंदिर भगवान शिव का है। बैजनाथ उत्तराखंड का एतिहासिक तीर्थस्थल है। कौसानी से महज 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बैजनाथ गोमती नदी के तट पर स्थित है। पर्यटकों के लिए यहां का सर्वाधिक आकर्षण 12वीं सदी में निर्मित भगवान शिव, गणेश, पार्वती, चंडिका, कुबेर व सूर्य के मंदिर हैं।

बागनाथ मंदिर से है बागेश्वर की पहचान

बागनाथ को एक प्राचीन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्थित है। इस मंदिर की नक्काशी प्रभावशाली है। मंदिर के नाम से ही बागेश्वर जिले का नाम पड़ा। यह मंदिर समुद्र तल से करीब 1004 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 

पौराणिक कथा के अनुसार बाबा मार्कण्डेय यहां शिव की पूजा करते थे। ऋषि मार्कण्डेय को आर्शीवाद देने के लिए भगवान शिव बाघ रूप में यहां आए थे। 1450वी शताब्दी में चंद शासक लक्ष्मी चंद ने इस मंदिर का निर्माण कराया। स्कंदपुराण में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है। यह छोटे चार धाम से भी पुराना तीर्थ स्थल माना जाता है।

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Posted By: Sunil Negi