पहाड़ के रंग जागरण के संगः नंदा... हिमालय की आस्था और लोक में बसी चेतना
मां नंदा देवी उत्तराखंड के हिमालयी जनजीवन का जीवंत स्पंदन हैं, जो यहां की संस्कृति, लोकसाहित्य और इतिहास से गहराई ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
दीप सिंह बोरा जागरण, अल्मोड़ा। उत्तराखंड के कण-कण में रची-बसी केवल एक पौराणिक देवी मात्र नहीं, बल्कि हिमालयी जनजीवन का वह जीवंत स्पंदन हैं, जिससे इस भूभाग की संस्कृति, लोकसाहित्य और इतिहास के सबसे गहरे तार जुड़े हैं। आदिदेव शिव व आदिशक्ति के मिलन की यह प्रतीक लोकमाता समय के हर थपेड़े को पार करते हुए आज भी पहाड़ के अंतर्मन और देवभूमि के लोकरंग में पूरी शिद्दत से रची-बसी है।
खास बात यह कि गढ़-कुमाँ गढ़-कुमाँ की साझी अराध्य मां नंदा को आर्यों के आगमन से पहले प्रकृति पुरुप यानि शिव शक्ति के उपासक शक्तिशाली खस व शकों ने अराध्य रूप में प्रतिष्ठित कर पूजा। कुमाऊं में पिथौरागढ़ तो गढवाल के टिहरी जिले में मां नंदा का सबसे प्राचीन मंदिर हिमालय की दो भुजाओं को अध्यात्म की डोर से बांधे है"
मध्य एशिया की नना से हिमालयी आंचल में नंदा
मां नंदा का स्वरूप प्राचीन है। युवा इतिहासकार भगवान सिंह धामी कहते हैं कि हिमालय में आर्यों के आगमन से सदियों पहले से यहां किरात (भिल्ल), कोल, शक व खस जैसी शक्तिशाली जातियां थीं। मध्य एशिया से विस्थापित होकर हिमालयी क्षेत्र में बसी इन जातियों के साथ यहां की लोकदेवी 'नना' का भी आगमन हुआ।
कुषाण राजवंश के स्वर्ण सिक्कों, अभिलेखों में जिस मध्य एशियाई 'नना देवी' का जिक्र मिलता है, इतिहासकार उसी को कालांतर में अपभ्रंश रूप में 'नंदा' मानते हैं। यही मध्य एशियाई देवी शक और खस जनजातियों के जरिये हिमालयी संस्कृति में घुल-मिल गई। बौद्धों की जातक कथाओं से लेकर कार्तिकेयपुर (जोशीमठ-कत्यूर) राजवंश की मोहरों तक में नंदा के साक्ष्य इसके ऐतिहासिक विस्तार की गवाही देते हैं।
नंदा राजजात है खास
देवभूमि उत्तराखंड में 280 किमी की सबसे लंबी सुप्रसिद्ध नंदा राजजात का सुदीर्घ पड़ाव हो या घर-आंगन में लगने वाली जागरें, मां नंदा का लोकस्वरूप उत्तराखंड की सांस्कृतिक एकता, अटूट आस्था व शाश्वत हिमालयी गरिमा का प्रतीक है।
यूं कहें कि मां नंदा शक्ति व आस्था की देवी ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति व आस्था में देवी है तो बेटी का रिश्ता भी है। नंदा को पुत्री के रूप में मायके बुलाया जाता है। फिर कैलास को भावुक विदाई भी दी जाती है।
शिव-शक्ति का लोकजीवन में अटूट प्रभाव
उत्तराखंड की लोक चेतना में शिव और नंदा का आधार इतना गहरा है कि यहां की बोलियों में भी इसके दर्शन होते हैं। अत्यधिक पीड़ा, आघात या संकट के क्षणों में अनायास ही मुंह से 'शिबौ-शिब' यानि शिव का नाम निकल पड़ता है, जो इस बात का प्रमाण है कि यहां की लोकभाषा और संस्कृति की अंतरात्मा में शिव गहराई तक समाए हुए हैं।
युवा इतिहासकार भगवान सिंह धामी कहते हैं, पुराणों में नंदा को नंद की पुत्री, कंस मर्दनी, भगवान कृष्ण की बहन और अंततः माता गौरी या पार्वती का ही स्वरूप माना गया है।
सीमांत की 'नंदुला' और अनूठी लोकगाथाएं
नेपाल से सटे धारचूला व सुदूर सीमांत क्षेत्रों में नंदा को 'नंदुला' रूप में पूजा जाता है। युवा इतिहासकार भगवान सिंह धामी के अनुसार यहां 'जागर' परंपरा में नंदा के आंचरी स्वरूप नंदुला का प्रभाव अनूठा है। सीमांत की लोककथाओं व जागरों में नंदुला को स्वर्ग यानी इंद्रलोक से अवतरित किया जाता है।
स्वर्ग के द्वार पर तैनात चार मुख वाले शेर से रक्षा पाने के लिए 'बिण भाट' के साथ 'चौसिंग खांडू' को आगे करने की कथा आज भी लोककंठ में जीवि है। लोकमान्यताओं के अनुसार, स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर ख शेर का ध्यान भटकाने के लिए चौसिंग्या खाडूं का सहारा लिया जाता है, ताकि बिण भाट सुरक्षित स्वर्गलोक में प्रवेश कर नंदुला का भूलोक पर अवतरण का आवाहन कर सकें।
राजवंशों का संरक्षण और महात्म्य का विस्तार
समय बीतने के साथ गढ़वाल, कुमाज के राजवंशों विशेषकर चंद और पंवान राजाओं ने मां नंदा के महात्म्य को भव सुव्यवस्थित रूप देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। गोरखाओं ने भी मां नदा को आराध्य शक्ति के रूप में महत्ता दी।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान की मानें तो गढ़वाल का सबसे प्राचीन नंदा मंदिर घनसाली के पास बजींगा गांव (टिहरी) में है, जो 11वीं सदी का है। वहीं, कुमाऊं में पिथौरागढ़ के बुंगाछीना के भट्यूड़ा में हरद्यो नदी के जलागम पर 9वीं सदी का नंदा मंदिर है।
यहां 8वीं सदी की प्रतिमा तो क्षरित हो चुकी है पर 14वीं सदी में निर्मित मां नंदा की चतुर्भुजी प्रतिमा आध्यात्मिक इतिहास की गवाही देती है। अल्मोडा में 17वीं सदी में चंद राजवंश ने नंदादेवी का मंदिर बनवाया।
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