यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 25, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बलिदानी राम सिंह बोरा के नाम पर नहीं बना इंटर कालेज
तहसील के भगरतोला गांव निवासी राम सिंह बोरा ने कारगिल में आतंकवादियों से लोहा लेते समय बलिदान दिया था।

बलिदानी राम सिंह बोरा के नाम पर नहीं बना इंटर कालेज
संवाद सूत्र, गरुड़ : तहसील के भगरतोला गांव निवासी राम सिंह बोरा ने कारगिल में आतंकवादियों से लोहा लेते समय बलिदान दिया था। कारगिल युद्ध में बलिदान देने वाले वे तहसील के एकमात्र जवान हैं। तब तत्कालीन सरकार के नुमाइंदों ने उनके गांव में इंटर कालेज बनाने के साथ ही अन्य सुविधाएं प्रदान किए जाने की घोषणा की। लेकिन 23 साल बाद भी घोषणा धरातल पर नहीं उतर पाई है।
भगरतोला के युवा फौजी राम सिंह बोरा के बलिदान पर सरकार ने उनके नाम पर इंटर कालेज बनाने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ है। शहीद बोरा का गांव भगरतोला न्याय पंचायत का मुख्यालय भी है। यह अटल आदर्श गांव योजना में भी शामिल है। लेकिन यहां सुविधाओं का टोटा बना है। स्वर्गीय हरक सिंह बोरा के छोटे पुत्र बलिदानी राम सिंह बोरा 10 पैरा में कमांडो थे। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान वे बटालिक सेक्टर में तैनात थे। उन्होंने कई आतंकवादी मार गिराए। लेकिन दुश्मन से लोहा लेते हुए मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने बलिदान दे दिया। भगरतोला में उनके बड़े भाई सेवानिवृत्त सूबेदार बलवंत सिंह रहते हैं। बलिदानी की पत्नी जानकी बोरा रानीखेत में रहती है। बोरा के बलिदान पर तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश के मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक उनके घर आए थे। उन्होंने तब बड़े-बड़े वायदे किए थे। गांव में पार्क बनाने और बलिदानी के नाम पर इंटर कालेज खोलने का वादा किया था। ये वादे आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं। भगरतोला के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शिव सिंह बोरा ने बलिदानी की याद में गांव में स्कूल खोला, लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद भी उसे इंटरमीडिएट का दर्जा नहीं मिल पाया है। उन्होंने बताया कि गांव की सड़क खस्ताहाल है। बिजली भी अक्सर गुल रहती है और बलिदानी के नाम पर कोई बड़ा अस्पताल भी नहीं बना। आज भी बलिदानी के गांव को विकास की दरकार है।
शहीद मोहन ने दिया था अदम्य साहस का परिचय
कपकोट के कर्मी निवासी कारगिल बलिदानी नायक मोहन सिंह ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से अलंकृत किया गया। वह टू नागा रेजीमेंट में तैनात थे। छह जुलाई 1999 को सेक्टर कमांडर के तौर पर बंप स्कावयर 4356 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने सात जुलाई की सुबह तीन दुश्मनों को मार गिराया और स्वयं भी बलिदान दे दिया। उनका परिवार वर्तमान में जिले से बाहर रहता है।
