रुद्रपुर की रामलीला: आतंकवाद के काले साये से निकलकर आस्था की अविस्मरणीय जीत
रुद्रपुर में 1991 के बम धमाके के बावजूद रामलीला की अटूट आस्था और भव्यता की कहानी। यह घटना आतंकवाद के ...और पढ़ें
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एआई जनरेटेड तस्वीर
HighLights
1991 में रुद्रपुर रामलीला पर हुआ था बम हमला।
आतंकी हमले ने आस्था को और अधिक मजबूत बनाया।
रामलीला अब भव्य स्वरूप में, प्रतिरोध का प्रतीक।
जागरण संवाददाता, रुद्रपुर(उधम सिंह नगर)। अटूट आस्था से जुड़ी यह कहानी करीब 35 बरस पुरानी है। कुमाऊं के उस आंगन की जहां मौत के साये ने दस्तक दी, मगर जनमानस की आस्था अडिग रही।
1991 में जब रुद्रपुर के मोहल्ला रम्पुरा में रामलीला का मंचन चल रहा था। अचानक भीषण बम धमाके ने उस पावन आयोजन को खून से भिगो दिया। कई दर्शक घायल हुए। चारों तरफ चीख-पुकार मची। मगर उस हमले ने आस्था को तोड़ने के बजाय उसे और अधिक मजबूत बना दिया।
दहशत के उस काले साये के बाद जिस दोगुने उत्साह और अटूट विश्वास के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं का कारवां यहां फिर से सजा। वह भारतीय लोक संस्कृति की अमरता का सबसे जीवंत दस्तावेज बन चुका है।
आतंकी हमले ने पैदा कर दी थी लोगों में दहशत
वह दौर ऐसा था जब पूरा देश और खासकर तराई का यह भूभाग आतंकवाद से जूझ रहा था। जब रुद्रपुर के मोहल्ला रम्पुरा में रामलीला का मंचन हो रहा था तो दर्शक दीर्घा खचाखच भरी थी। बच्चे, बूढ़े, युवा सबकी निगाहें मंच पर टिकी थीं। तभी जोरदार धमाका हुआ। पलक झपकते ही चारों तरफ धुआं फैल गया। अफरा-तफरी मची और अपनों की तलाश में दौड़ते बिलखते दर्शकों ने सबके दिल को झकझोर कर रख दिया। इस कायराना हमले में कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
पुलिस प्रशासन सकते में आ गया था। चिकित्सालय में तड़पते घायलों को देख पूरा शहर स्तब्ध था। मगर सनातनी संस्कृति के इस केंद्र की आस्था ने आतंकवादियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। स्थानीय लोगों और रामलीला कमेटी की आस्था और मजबूत हुई और कुछ ही दिनों के भीतर रम्पुरा के उसी रामलीला मैदान पर राम पताका लहराने लगी।
अब भव्य स्वरूप में आ गई रामलीला
उस बम धमाके के बाद रुद्रपुर की रामलीला पहले से कहीं अधिक भव्य रूप में सामने आई। लोगों की भीड़ कम होने के बजाय और अधिक उमड़ने लगी। हर माता-पिता, हर युवा और बुजुर्ग ने यह मान लिया था कि संस्कृति पर प्रहार का जवाब सिर्फ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से और अधिक मजबूती से जुड़कर ही दिया जा सकता है।
रम्पुरा की वह रामलीला महज एक मंचन नहीं रह गई थी, बल्कि वह आतंकवाद के खिलाफ आम जनमानस के एकजुट प्रतिरोध और अजेय आत्मबल का प्रतीक बन चुकी थी। आज दशकों बाद भी जब उस दौर को याद किया जाता है तो रम्पुरा की वह रामलीला रोंगटे खड़े कर देती है। आज मुख्य रामलीला मैदान के साथ ही रम्पुरा में दो स्थानों पर मंचन होता है। वहीं इंदिरा कॉलोनी,भूत बंगला व भूरारानी में भी रामलीला होने लगी है।
