विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

ऑस्ट्रेलिया से लौटे डॉ. नीरज पंत ने बंजर भूमि को बनाया उपजाऊ, उत्तराखंड में बदली ग्रामीणों की किस्मत

Published: Tue, 20 Oct 2026 05:12 PM (IST)

ऑस्ट्रेलिया में शोध करने वाले डॉ. नीरज पंत उत्तराखंड के अल्मोड़ा में बंजर भूमि को उपजाऊ बना रहे हैं। उन्होंने ...और पढ़ें

अल्मोड़ा के नौगांव में डाॅ. नीरज का शहतूत के पौधों के बीच मिश्रित खेती का प्रयोग रंग ला रहा है। जागरण

अल्मोड़ा के नौगांव में डाॅ. नीरज का शहतूत के पौधों के बीच मिश्रित खेती का प्रयोग रंग ला रहा है। जागरण

HighLights

  1. डॉ. नीरज पंत ने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया।

  2. 400 बीघा पर 2 लाख शहतूत के पौधे लगाए।

  3. 200 किसानों को रोजगार, ₹20 लाख की आय।

संतोष बिष्ट, अल्मोड़ा। आस्ट्रेलिया में शोध और वैज्ञानिक कार्यों से जुड़ा जीवन छोड़कर उत्तराखंड लौटे डॉ. नीरज पंत परती (बंजर) पड़ी भूमि में कामयाबी की फसल उगा रहे हैं। अल्मोड़ा के खूंट धामस गांव निवासी डॉ. पंत ने हिमालयी जलस्रोतों, नदियों और जल संरचनाओं पर शोध के बाद अपना काम खेतों तक पहुंचाया। उनका उद्देश्य केवल परती जमीन को उपजाऊ बनाना नहीं, बल्कि जल संरक्षण, भूमि सुधार, ग्रामीण रोजगार और पलायन को रोकने के लिए ऐसा खेती का माडल तैयार करना है, जिसे पहाड़ के छोटी जोत वाले किसान भी अपना सकें।

हाइड्रो जियोलाजी के क्षेत्र में काम करने वाले डॉ. नीरज पंत ने अलकनंदा समेत हिमालयी नदियों और गंगा के जलचक्र पर शोध किया है। उन्होंने वर्ष 2020 में आईआईटी धनबाद से ग्लेशियर हाइड्रोलाजी पर पीएचडी की। इसमें ग्लेशियरों के पिघलने से पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया।

वर्ष 2025 में वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया से दूसरी पीएचडी की। वहां से शोध के लिए जो धनराशि मिली, उससे उन्होंने अल्मोड़ा क्षेत्र में जलस्रोतों के सूखने के कारणों पर शोध कार्य किया और निहिर हिमालयन संस्थान बनाया। इसी शोध ने उन्हें वापस अपने खेतों तक पहुंचाया।

इस तरह शुरू हुआ भूमि सुधार का सफर

डॉ. नीरज पंत बताते हैं कि जलस्रोतों को बचाने के लिए केवल पानी पर काम करना पर्याप्त नहीं है। परती भूमि को उत्पादक बनाकर उसमें पानी रोकने और भूमि सुधार की भी जरूरत है। इसके लिए उन्होंने काश्तकारों से बातचीत की और फिर कार्य शुरू किया।

9alm5

आईआईटी रुड़की के माध्यम से मिट्टी की जांच कराई। वर्ष 2024 से करीब 400 बीघा बंजर और पथरीली जमीन पर शहतूत की खेती शुरू की। तारबाड़ और जमीन तैयार करने समेत अन्य कार्य पर वह अब तक करीब 30 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। शहतूत के दो लाख पौधे लगाए हैं।

इसके साथ ही रेशम कीट पालन और हर्बल टी तैयार करने की दिशा में काम हो रहा है। इसके साथ ही 40 बीघा भूमि में मिश्रित खेती की जा रही है। हल्दी, अदरक, गहत समेत अन्य फसलें उगाई जा रही हैं। इस वर्ष करीब 500 किलो जैविक हल्दी और 1000 किलो अदरक का उत्पादन हुआ है।

200 काश्तकार जुड़े

डॉ. नीरज की इस पहल में करीब 200 महिला-पुरुष काश्तकार भी जुड़े हैं। काश्तकारों को करीब 20 लाख रुपये की आय हुई है। जिनके पास जमीन है, वे शहतूत संग हल्दी, अदरक व दालें उगा रहे हैं। जिनके पास भूमि नहीं है, वे इनके खेतों में काम पा रहे हैं। डॉ. पंत के अनुसार पहाड़ में छोटी जोत होना बड़ी चुनौती है।

अधिकांश परिवारों के पास दो-तीन नाली जमीन है। ऐसे में केवल पारंपरिक खेती से सालभर की आय संभव नहीं है। तापमान में बदलाव को देखते हुए फसल चयन भी बदलना होगा। साथ ही अब खेती को बाजार से जोड़ना जरूरी है।

मेरी प्राथमिकता अभी मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि पहाड़ में खेती का टिकाऊ व कमाऊ माडल तैयार करना है। पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ में ही रोकने के लिए खेती को रोजगार से जोड़ना होगा। रेशम कीट पालन समूह के माध्यम से रोजगार लोगों के लिए अच्छा विकल्प है। इसमें नियमित आय की संभावना है और उत्तराखंड में बाजार भी उपलब्ध है। मेरा लक्ष्य है कि बंजर जमीन उपजाऊ में बदले, स्थानीय लोगों को काम और युवाओं को गांव में ही आय का विकल्प मिले।

-डॉ. नीरज पंत

यह भी पढ़ें- मेरठ में शहतूत के पेड़ पर अजगर देखते ही भाग खड़े हुए युवक, मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम

यह भी पढ़ें- कश्मीर के रेशम उद्योग पर संकट, 200 साल पुरानी ऐतिहासिक शहतूत नर्सरी उजाड़ने की तैयारी; जानिए क्या है मामला