मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

संवाद सहयोगी, चौखुटिया: गांवों से बढ़ता पलायन मानें या फिर पब्लिक स्कूलों का बढ़ता क्रेज। कारण चाहे जो भी हों.। वर्ष दर वर्ष सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या तेजी से घट रही है। राजकीय प्राथमिक विद्यालयों का तो और भी बुरा हाल है, जहां ढूंढे भी बच्चे नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में प्राथमिक स्कूलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हालत यह है कि विकास खंड में दो दर्जन से अधिक विद्यालय बंद हो चुके हैं। डेढ़ दर्जन से अधिक बंदी के कगार पर हैं तथा दस से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों की संख्या 41 को पार कर गई है।

यूं तो सरकारी बुनियादी शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं व कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों व बच्चों का घटता रूझान इन तमाम कवायदों पर पानी फेर रहा है। नतीजा स्कूलों में छात्र संख्या बढ़ने के बजाए घट रही है। यही हालात रहे तो कुछ वर्षो में ही अधिकांश प्राथमिक स्कूल बंद हो सकते हैं। दूरस्थ गांवों से बढ़ रहा पलायन भी इसका एक कारण माना जा रहा है। वहीं सडुक या घनी आबादी वाले भागों में अभिभावकों का क्रेज पब्लिक स्कूलों के प्रति बढ़ता चला जा रहा है। वहीं रही सही कसर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी पूरी कर दे रही है।

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इन विद्यालयों पर लटक चुके हैं ताले

राप्रावि थापला, चक डोबरी, कबड़ोला, नगारसीम, नौगांव, जेठुवा, फड़िका, माडकूबाखल, ढौन, असेटी, प्रेमपुरी, चनौला, बिनसर, गड़स्यारी, उल्लैणी, मल्ला गतार, तल्ला गजार, छाना, बमनगांव, जाला आदि।

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ये विद्यालय हैं बंदी के कगार पर

राप्रावि धुधलिया बिष्ट, राप्रावि अगनेरी, राप्रावि गैलगबोली, सीमापानी, ढ़नाण, कन्याणी, दीपाकोट, ककड़खेत, कबडा़ली। इनकी छात्र संख्या 3 से कम है।

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एक नजर 10 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों पर

राप्रावि बसोडी, मोहणा, आदिग्राम फुलोरिया, गोपालगांव, गोपालगांव सुरना, तिमिलखाल, कोट्यूड़ा-नवीन, लालुरी, खोला बसरखेत, गर्जिया, बसरखेत, खजुरानी, गोदी, टेड़ागांव, सीरा, भगतोला, बैरती गैराड़, बसभीड़ा, रामपुर, सिमलखेत, जैंठा, खत्याड़ी, बाइस ओखला, भटकोट, थनीगांव, उड़लीखान।

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वर्ष दर वर्ष घटती छात्र संख्या का वृत्त

वर्ष बालक बालिका कुल

2015-16 714 891 1605

2016-17 684 810 1484

2017-18 615 735 1350

2018-19 534 651 1185

2019-20 508 586 1094

Posted By: Jagran

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