वाराणसी, जेएनएन। भारतीय कालगणना परंपरा में वर्ष मास दिन मुहूर्त प्रहर सभी का नामकरण करते हुए उनके द्वारा शुभाशुभ फल ज्ञान की परिकल्पना है संप्रति विक्रम संवत 2078 के आगमन के साथ ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय सनातन नववर्ष का आरंभ तो हो गया है परंतु इस वर्ष का नाम आनंद हो या राक्षस इसको लेकर के विद्वानों में मतान्तर की स्थितियां उत्पन्न हो गई है।विक्रम संवत 2078 के आगमन के साथ ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय सनातन नववर्ष का आरंभ तो हो गया है परंतु इस वर्ष का नाम आनंद हो या राक्षस इसको लेकर के विद्वानों में मतान्तर की स्थितियां उत्पन्न हो गई है जिसका परिणाम देश के विभिन्न क्षेत्रो/प्रान्तों से प्रकाशित होने वाले पंचांगों में स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है देश के कुछ पंचांगकारों ने अपने पंचांग में संवत्सर का नाम आनंद तो कुछ पंचांगकारों ने अपने पंचांगों में संवत्सर का नाम राक्षस दिया है जिससे जनमानस एवं सनातन धर्मावलंबियों में भी भ्रम की स्थितियां उत्पन्न हो गयी है।

भारतीय काल गणना पद्धति में चंद्र, सौर, सावन, नक्षत्र एवं बार्हस्पत्य इत्यादि अनेक मानों का समवेत रूप में व्यवहार होता है जिससे कि काल गणना की निरंतरता बनी रहे तथा कालांतर जन्य प्रभाव से इसमें कोई दोष उत्पन्न ना हो इसीलिए हमारे पूर्वज महर्षियों ने अनेक काल मानो का व्यवहार करते हुए काल व्यवस्था को संचालित किया है जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण के रूप में प्रत्येक तीसरे वर्ष में पड़ने वाले अधिक मास एवं कालांतर में पड़ने वाले क्षयमास को स्पष्ट रूप में देख सकते हैं इसी प्रकार तिथि क्षय एवं तिथियों की वृद्धि भी होती है परंतु तिथि और मासों के अतिरिक्त वर्ष का भी वृद्धि एवं क्षय होता है जिसे हम लुप्तसंवत्सर या अधिसंवत्सर के नाम से जानते हैं।सामान्यतया यह स्थिति 80 से 90 वर्षों के अंतराल में उत्पन्न होती है।

इसका कारण यह है कि हम पंचांग परंपरा में मास का व्यवहार चन्द्र मान से वर्ष का व्यवहार सौरमान से तथा संवत्सर का व्यवहार बार्हस्पत्य मान द्वारा करते हैं यद्यपि बृहस्पति का मध्यम गति से राशि परिवर्तन होने पर संवत्सर का नाम परिवर्तित हो जाता है। परंतु चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन जो संवत्सर होता है उसी की संकल्प आदि में वर्ष पर्यंत गणना की जाती है परन्तु यदा-कदा ऐसी भी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जब स्वाभाविक रूप में किसी संवत्सर की प्रवृत्ति नहीं होती और उसे क्षय वर्ष अथवा लुप्त संवत्सर के नाम से जाना जाता है। विगत 5 -7 वर्षों से कुछ पंचांग कारों ने अपने पंचांगों में लुप्त संवत्सर का विनियोग करके वर्तमान में राक्षस नामक संवत्सर का उल्लेख किया है जबकि शुद्ध गणना पद्धति से अभी किसी संवत्सर का लोप प्राप्त नहीं हो रहा है अतः इस वर्ष आनंद नामक संवत्सर ही होगा तथा वर्ष पर्यन्त संकल्पादि गणना में आनंद नामक संवत्सर का प्रयोग करना ही उचित होगा।

इस विषय को लेकर काशी विद्वत परिषद के ज्योतिष प्रकोष्ठ की बैठक ऑनलाइन माध्यम से परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष  प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय जी के अध्यक्षता में आरंभ हुई जिस का संचालन परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने किया विषय वस्तु को स्थापित करते करते हुए परिषद के संगठन मंत्री एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पाण्डेय ने उपर्युक्त विषय को स्पष्ट करते हुए शास्त्र का पक्ष विद्वत समाज के सामने रखा जिस पर सभी विद्वानों ने सर्वसम्मति पूर्वक अपनी सहमति देते हुए संवत्सर का नाम वर्ष पर्यंत आनंद ही व्यवहार में लाने की अपनी सहमति प्रदान की इसी के साथ अध्यक्षद्वय के उद्बोधन के साथ संगोष्ठी की समाप्ति हुई तथा लोक हित में इस विषय वस्तु को प्रसारित-प्रचारित करने का निर्णय लिया गया। बैठक में मुख्यरूप से वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रो.वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. चन्द्रमौली उपाध्याय , प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री, डॉ. सुभाष पाण्डेय आदि अनेक विद्वान उपस्थित रहे।

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप