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काशी में ऐसी गली जहां बसता है जगन्नाथ पुरी का आध्यात्मिक संसार, आज भी जिंदा है 200 साल पुरानी परंपरा

Published: Sat, 26 Sep 2026 02:47 PM (IST)Updated: Sat, 26 Sep 2026 02:50 PM (IST)

काशी की जगन्नाथ गली में पुरी की धार्मिक संस्कृति और संन्यास परंपरा का अनूठा संगम है, जहां 200 साल पुरानी जगन्नाथ उपासना आज भी जीवंत है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

HighLights

  1. जगन्नाथ गली में पुरी की धार्मिक संस्कृति का अनूठा संगम।

  2. 1802 में स्थापित जगन्नाथ मंदिर, 200 साल पुरानी परंपरा।

  3. दक्षिणामूर्ति मठ और संन्यास परंपरा का विशेष महत्व।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी की गलियों में आस्था के अनेक रंग हैं, लेकिन असि क्षेत्र की जगन्नाथ गली की पहचान कुछ अलग है। यहां भगवान जगन्नाथ की उपासना के साथ दक्षिणामूर्ति परंपरा, संन्यास और पुरी की धार्मिक संस्कृति का अनूठा संगम दिखाई देता है।

असि घाट से लगी यह गली केवल आवागमन का रास्ता नहीं, बल्कि काशी की उस आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है जहां देश के अलग-अलग तीर्थों और मठों की परंपराएं एक-दूसरे में घुलती नजर आती हैं।

गली में प्रवेश करते ही जगन्नाथ मंदिर और उससे जुड़े मठ-आश्रम इसकी विशिष्ट पहचान का अहसास कराते हैं। असि स्वयं गंगा और असि नदी के संगम तथा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के कारण काशी के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में है।

काशी में पुरी का प्रतिरूप

असि चौराहे से असि घाट की ओर जाने वाले मार्ग से लगभग जगन्नाथ मंदिर के आगे रविदास पार्क तक निकलने वाली यह गली लगभग 500 मीटर लंबी है। इस गली की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित जगन्नाथ मंदिर है। अस्सी क्षेत्र के इस मंदिर परिसर को पुरी क्षेत्र का प्रतीक माना जाता है।

उपलब्ध विरासत विवरण के अनुसार मंदिर की स्थापना 1802 में हुई थी और इसके निर्माण में बनारस में रहने वाले नागपुर के भोंसले राजघराने से जुड़े बेनी राम और विश्वंभर राम का सहयोग रहा था।

यही वजह है कि यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की आराधना में पुरी की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। रथयात्रा के दौरान यह क्षेत्र विशेष रूप से जीवंत हो उठता है। 2026 में भी अस्सी स्थित मंदिर और पूर्वाम्नाय दक्षिणामूर्ति मठ में पुरी की परंपराओं के अनुरूप अनुष्ठान और भोग की परंपरा निभाई जाती है।

दक्षिणामूर्ति मठ से जुड़ी सनातन परंपरा

जगन्नाथ गली का एक महत्वपूर्ण आकर्षण पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ भी है। अस्सी स्थित यह परिसर पुरी पीठ की परंपरा से जुड़ा है। यहां भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना और संन्यासी परंपरा के साथ जगन्नाथ उपासना का संबंध इस गली को विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान देता है। हाल के वर्षों में यहां दक्षिणामूर्ति मंदिर के पुनर्निर्माण और धार्मिक आयोजनों ने इसकी गतिविधियों को और विस्तार दिया है।

कई विभूतियों का रहा है निवास

इसी गली में भोजपुरी के महाकवि कहे जाने वाले चंद्रशेखर मिश्र का निवास हे तो विद्वान भागवत विद्यालंकार पारस, योगाचार्य प्रदीप कुमार मिश्र भी इसी गली में रहते आए हैं। नागा बाबा की कुटिया में लगभग आठ दशक पूर्व सिद्ध दिगंबर संत रहा करते थे। वे थे तो गृहस्थ परंतु बाद में संन्यास लिया और सिद्धियां प्राप्त कीं। असि घाट पर हनुमान मंदिर में पुजारी भी थे।

गंगा के किनारे असि घाट की सांस्कृतिक हलचल और भीतर गलियों में बसे मंदिर-मठों की शांति, जगन्नाथ गली इसी विरोधाभास को अपने भीतर समेटे है। यहां पुरी दूर नहीं लगता और काशी अपनी पूरी आत्मीयता के साथ सामने आती है। यही संगम जगन्नाथ गली को काशी की उन गलियों में शामिल करता है, जहां रास्ते से अधिक परंपरा मंजिल बन जाती है।

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