भारत की ज्ञान विरासत सहेजने के लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण शुरू, दस्तावेजीकरण के लिए जनभागीदारी का आह्वान
संस्कृति विभाग ने भारत की प्राचीन ज्ञान विरासत को सहेजने के लिए 'ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण' शुरू किया है। ...और पढ़ें

संस्कृति विभाग ने ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण शुरू किया।
प्रमोद यादव, वाराणसी। भारत अपनी सभ्यता-संस्कृति के लिए जाना जाता है। सदियों पूर्व श्रुति परंपरा से ज्ञान-विज्ञान पीढ़ियों में हस्तांतरित होता रहा, फिर पांडुलिपियों को माध्यम से सहेजा। इस ‘ज्ञान विरासत’ का बड़ा हिस्सा घरों, मठ-मंदिरों, पुस्तकालयों से लेकर संस्थानों तक में बिखरा पड़ा है और दस्तावेजीकरण रहित है।
इसके संरक्षण के लिए संस्कृति विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास शुरू किया है, जिसे ‘ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण’ नाम दिया है। देशभर में पांडुलिपि भंडारों को भौगोलिक रूप से चिह्नित कर राष्ट्र स्तरीय सूची तैयार की जा रही है।
यह प्रयास राष्ट्रीय 'पांडुलिपि मानचित्र' बनाने में सहायक होगा, जिससे व्यवस्थित सूचीकरण, संरक्षण योजना और दीर्घकालिक अनुसंधान संभव हो सकेगा। इस अभियान में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय समेत देशभर में 15 क्लस्टर और नागरीप्रचारिणी सभा काशी समेत दो दर्जन स्वतंत्र इकाइयां शामिल हैं। दोनों ही स्थानों पर पांडुलिपियों की स्कैनिंग और मेटा डेटा क्रिएशन का काम चल रहा है।
वेबसाइट के माध्यम से जन भागीदारी को प्रोत्साहित कर रहा
ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण, ज्ञान भारतम् मोबाइल एप्लिकेशन और वेबसाइट के माध्यम से जन भागीदारी को प्रोत्साहित कर रहा है। इसमें पांडुलिपियों के संरक्षक जैसे परिवार, मठ-मंदिर और संस्थान अपने पास उपलब्ध पांडुलिपियों के बारे में बता सकते हैं। समुदाय में पांडुलिपि संग्रहों से अवगत व्यक्ति-संस्थान भी इसकी जानकारी दे सकते हैं।
व्यक्तिगत या सांस्थानिक रूप से पांडुलिपि दस्तावेजीकरण किया जा रहा
यह पूरी प्रक्रिया स्वैच्छिक तो है ही, किसी तरह से स्वामित्व को प्रभावित नहीं करती और न पांडुलिपियों के हस्तांतरण की जरूरत होती है। सर्वेक्षण में सिर्फ बुनियादी जानकारी जैसे-स्वामित्व प्रकार, जिला और पांडुलिपियों का स्थान, अनुमानित संख्या, संरक्षण अवधि और उपलब्ध विवरण जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से देशभर में व्यक्तिगत या सांस्थानिक रूप से पांडुलिपि दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।
सर्वेक्षण के चार चरण
डिजिटल प्लेटफार्म पर प्रस्तुत जानकारी के माध्यम से पांडुलिपियों और उनके स्थानों की पहचान कर राष्ट्रीय पांडुलिपि उपस्थिति मानचित्र का निर्माण। विशेषज्ञों द्वारा भौतिक सत्यापन। सूचीकरण और मेटाडेटा निर्माण, जैसे भाषा, लिपि और विषय की पहचान। दीर्घकालिक संरक्षण के लिए डिजिटलीकरण।
हिंदी की पांडुलिपियों की खोज का पहला अभियान वर्ष 1900 में
नागरीप्रचारिणी सभा बहुत गौरवान्वित है कि लगभग एक सदी बाद उसे फिर से हस्तलेखों और पांडुलिपियों की खोज, सर्वेक्षण और संरक्षण की दिशा में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर मिला है। हिंदी की पांडुलिपियों की खोज का पहला अभियान वर्ष 1900 में सभा ने ही शुरू किया था। उनकी कैटलागिंग और विधिवत शोधन, पाठ-संपादन के माध्यम से देश को कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, कुतुबन और मंझन की प्रामाणिक रचनावलियों का उपहार दिया था। - पं. व्योमेश शुक्ल, प्रधानमंत्री, नागरीप्रचारिणी सभा काशी
यह भी पढ़ें- अब बिना एग्जाम दिए ट्रैक मेंटेनर बनेंगे जूनियर इंजीनियर, रेलवे बोर्ड ने प्रमोशन प्रोसेस में किया बड़ा बदलाव
